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Wp/mag/गया

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मण्डल गया मण्डल
राज्ज बिहार
देस  भारत
बोधगयाके महाबोधि मन्दिर

गया भारतके बिहार राज्जके गया मण्डलमे स्थित एगो नगर हे । ई मण्डलके मुख्यालय आउ बिहार राज्जके दुसरा सबसे बड़का नगर हे । ई नगरके हिन्दू, बौद्ध आउ जैनधरममे गहरा ऐतिहासिक महत्व हे । नगरके उल्लेख रामायण आउ महाभारतमे मिलहे । गया तीन दन्नेसे छोट आउ पत्थरीला पहाड़से घिरल हे, जिनखर नाम मङ्गलागौरी, श्रृङ्गस्थान, रामसिला आउ ब्रह्मजोनि हे । नगरके पूरुदन्ने फल्गूनदी बहहे ।

बिवरण[edit | edit source]

बैदिक कीकटप्रदेशके धर्मारण्यक्षेत्रमे स्थापित नगरी हे गया । बनारस नियन गयाके प्रसिद्धि मुख्यरूपसे एगो धार्मिक नगरीके रूपमे हे । पितृपक्षके अवसर पर हिँया हजारोँ श्रद्धालु पिण्डदानला जुटहथ ।[1][2] गया सड़क, रेल आउ वायुमार्ग द्वारा पूरा भारतसे जुड़ल हे । नवनिर्मित गया अन्तरराष्ट्रीय बिमानक्षेत्र द्वारा ई थाइलेण्डोसे सीधा जुड़ल हे । गयासे १३ किलोमीटरके दूरीपर बोधगया स्थित हे जे बौद्ध तीर्थस्थल हे आउ हिँये बोधिवृक्ष तले भगवान् बुद्धके ज्ञान प्राप्ति होलहल ।

गया बिहारके महत्वपूर्ण तीर्थस्थानमे से एक हे ।[3] ई नगर बिसेसकर हिन्दु तीर्थजातरी लागि बड्डी प्रसिद्ध हे । हिँयाके विष्णुपद मन्दिर पर्यटकके बीच लोकप्रिय हे ।[4] पुराणके अनुसार भगवान् विष्णुके पाँवके निशानपर ई मन्दिरके निर्माण करावल गेलहे । हिन्दुधरममे ई मन्दिरके अहम स्थान प्राप्त हे । गया पितृदानो लागि प्रसिद्ध हे । कहल जाहे कि हिँया फल्गुनदी तटे पिण्डदान करेसे मृतव्यक्तिके बैकुण्ठके प्राप्ति होवहे ।

गया, मध्यबिहारके एगो महत्वपूर्ण नगर हे, जे फल्गुनदी तटे स्थित हे । ई बोधगयासे १३ किलोमीटर् उत्तर आउ राजधानी पटनासे १०० किलोमीटर् दक्खिनदन्ने स्थित हे । हिँयाके मौसम मिललजुलल हे । गरमी दिने हिँया बड्डी गरमी पड़हे आउ जाड़ा दिने औसत जाड़ा होवहे । मानसूनोके हिँयाके मौसमपर व्यापक असर होवहे । किन्तु बर्षाऋतुमे हिँयाके दृश्य बड्डी रोचक होवहे ।

कहल जाहे कि गयासुर नामक दैत्यके बध करित समय भगवान् विष्णुके पदचिन्ह हिँया पड़लहल जे आझो विष्णुपद मन्दिरमे देखल जा सकहे । मुक्तिधामके रूपमे प्रसिद्ध गया (तीर्थ) के खाली गया न कहके आदरपूर्वक 'गयाजी' कहल जाहे ।

इतिहास[edit | edit source]

गयाके उल्लेख महाकाव्य रामायणो मे मिलहे । गया मौर्यकालमे एगो महत्वपूर्ण नगर हल । खुदाईखनि सम्राट अशोकसे सम्बन्धित आदेशपत्र पाएल गेलीहे । मध्यकालमे बिहार मुगलसम्राटके अधीन हल । मुगलकालके पतन उपरान्त गयापर अङ्ग्रेज राज करकै । १७८७ मे होल्कर वन्शके ( बुन्देलखण्डके ) साम्राज्ञी महारानी अहिल्याबाई विष्णुपद मन्दिरके पुनर्निर्माण करवैलकैहल । मेगास्थनीज् के इण्डिका, फाह्यान् आउ ह्वेनसाङ्ग् के जतराबर्णनमे गयाके एगो समृद्ध धर्मक्षेत्रके रूपमे बर्णन हे ।[5]

गम्यता[edit | edit source]

वायुमार्ग[edit | edit source]

बिहार आउ झारखण्डके एकमात्र अन्तरराष्ट्रीय बिमानक्षेत्र गया बिमानक्षेत्र हे ।

रेलमार्ग[edit | edit source]

गया जङ्कशन् बिहारके दुसरा बड़का रेलवे स्थानक हे । ई एगो बिशाल परिसरमे स्थित हे जेकरामे ९ प्लेटफार्म् हे । गयासे पटना, राँची ,कलकता, धनबाद, पुरी, बनारस, चेन्नै, मुम्बई, नया दिल्ली, नागपुर, गुवाहाटी, जयपुर, अजमेरशरीफ्, हरिद्वार, ऋषिकेश, जम्मूतवी आदि लागि सीधा ट्रेन् हे ।

सड़कमार्ग[edit | edit source]

गयासे राजधानी पटना आउ राजगीर, राँची, धनबाद, बनारस आदि लागि बस् जाहे । गयामे दुगो बसस्टेण्ड् हे ।

शिक्षा[edit | edit source]

उच्चशिक्षाके उल्लेखनीय सन्स्थान[edit | edit source]

उल्लेखनीय बिद्यालय[edit | edit source]

  • क्रेन् मेमोरियल् उच्चबिद्यालय, कटारीहिल् रोड्, गया
  • केन्द्रीय बिद्यालय नम्बर २, ओटीए, पहाड़पुर कैण्ट्, गया
  • ज्ञानभारती आवासीय परिसर, बोधगया
  • डी॰ए॰वी॰ पब्लिक् स्कूल्, कैण्टक्षेत्र, गया
  • डी॰ए॰वी॰ पब्लिक् स्कूल्, मानपुर, कैया
  • डी॰ए॰वी॰ पब्लिक् स्कूल्, सीआर् आरसी, मेडिकलरोड्, गया
  • दिल्ली पब्लिक् स्कूल्, दुबहल, गया
  • नाजरथ अकादमी, गया
  • पीएम श्री केन्द्रीय बिद्यालय नम्बर् १ , गया
  • हन्सराज पब्लिक् स्कूल्, कैण्टक्षेत्र, खराण्टी, गया

सम्बन्धित लेख[edit | edit source]

सन्दर्भ[edit | edit source]

  1. "पितरों के लिए गया". Dainik Jagran. मूल से 2 मार्च 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 1 मार्च 2019.
  2. "संग्रहीत प्रति". मूल से 8 दिसंबर 2014 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 7 दिसम्बर 2014.
  3. "बिहार की यात्रा का नक्शा | बिहार की यात्रा - पर्यटन, गंतव्य, होटल, परिवहन". मूल से 2 मार्च 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 1 मार्च 2019.
  4. "सुबोध कुमार नंदन का आलेख- महातीर्थ गया". www.abhivyakti-hindi.org. मूल से 11 मार्च 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 1 मार्च 2019.
  5. Antiquarian remains of Bihar, Rangnath Ramchandra Diwakar, Motilal Banarsi Das Press, P. no.162