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पाकिस्तान में राजस्थानी[edit | edit source]

पाकिस्तान रा अेक बड़ा हिस्सा में आज ईं राजस्थानी भाषा चलै। पाकिस्तान रा प्रसिद्ध आलोचक अर सिरजक बाग अली सौक री पोथी 'राजस्थानी जबान-ओ-अदब' नाम सूं उरदू में छपी। इणी रा एक अध्याय 'आधुनिक राजस्थानी साहित्य री पिछाण' सूं कीं जाणकारी 'माणक' रा जनवरी 1994 रा अंक में छपी। पाकिस्तान रा राजस्थानी साहित्यकारां रौ दळ 1994 में 'माणक' रा दफतर में जोधपुर आयो। इणां रो घणो मान करीजियो। बाग अली सौक रा सबदां में- पाकिस्तान में राजस्थानी साहित्य रो इतिहास घणो जूनो। सिंध-पंजाब री सीवां रा इलाका में तो इणरो घणो असर। थारपारकर अर आं जागावां में राजस्थानी लोकगीत अणूंता चावा। जलालो, चनेसर, मटयारो, सावणी तीज, करहो, अम्रलो, पटयारी, मरवण, मूमल, रायधण अर घौंसळो इत्याद खास। कराची में सिलावट बिरादरी रा कीं मोट्यारां मिल'र सन् 1955 में 'अंजुमन मारवाड़ी सोअरा' नाम री संस्था गठित करी। इण संस्था कई जगां उरदू अर राजस्थानी कवि-सम्मेलन राखिया। इण संस्था रा संस्थापक अर कवियां मैसूस करियो कै उरदू री लिपी में राजस्थानी लिखणो संभव नीं। इण सारू स्व. यार मोहम्मद रमजान 'नसीर' इत्याद कवि लिपि में सुधार कर'र लिखण री कोसीस करी। आ सरूआती कोसीस गति पकड़ी। सन् 1955 सूं 1965 तक जका कवि आगै आया, वां में कीं खास नाम है- मास्टर अब्दुल हमीद जैसलमेरी, यार मो. चौहान 'ताहिर', बाग अली सौक जैसलमेरी, मो. रमजान 'नसीर', ओरंगजेब 'जिया', असरफ अली 'अफसोस', कुरबान अली चौहान अर महमूद दार कस्मीरी। पछै 'सिलावट वेलफेयर स्टूडेन्ट फैडरेसन' री तरफ सूं सालीणा इनामी कवि-सम्मेलनां री सरूआत व्ही। ऐ कवि-सम्मेलन घणा चावा व्हिया 'यूथ प्रोग्रेसिव कॉन्सिल' नाम री संस्था इणां कवि सम्मेलनां रो इंतजाम करती। विण वगत जका कवि आगै आया वां में युनुस नीर, युनुस राही, लियाकत अली 'दीपक', निसार 'तालिब', जियाऊदीन 'परवाज', इकबाल 'बर्क', लियाकत 'राज', अब्दुल मजीद 'चिंगारी', बसीर अहमद 'बसीर' अर मो. हनीफ काळू खास हा। भारत-पाक जुद्ध (1971) रै कीं बरसां पछै 1976 में 'राजस्थानी अदब सभा' री नींव राखीजी। इणरी तरफ सूं खेलिजियो पैलो नाटक 'एनात-अपूजी बात' घणो नांमी व्हियो। डोढ-दो बरसां री लगोलग कोसीसां रै पछै राजस्थानी भाषा री व्याकरण त्यार करीजी अर राजस्थानी व्याकरण री कीं खास-खास बातां तै व्ही। ओ काम सैयद सिब्तै हसन पार पटकियो। वै पाकिस्तान रा अंग्रेजी दैनिक 'डॉन' में राजस्थानी नै लेय'र लेख भी लिखिया। आ सभा ब्याव-सादी रा संस्कार गीतां रा कैसिट गुलाम अली री धुनां माथै त्यार कराया। राजस्थानी नाटकां रो सिलसिलो पण सरू व्हियो। राजस्थानी रचनावां रा उरदू, सिंधी, बलोची अर पंजाबी में अनुवाद कराया। खास कर'र 'गोल्डन-जुबली' इत्याद अवसरां पर कवि चावा व्हिया। जकां में सरदार अली चौहान, फारूक आजम फरीद, रजब अली 'गम' अर फिरोज अली 'फिरोज' खास। करांची में 1904 ई. में जलम्या श्री अब्दुल हमीद 'हमीद' राजस्थानी में सांतरै सिरजण सारू आज भी घणा मान सूं याद करीजै। इणरै अलावा पाकिस्तान में डिंगळ सैली रो साहित्य बड़ी मात्रा में रचीजियो जको क्रम आज भी जारी है। लोक-साहित्य भी भांत-भांतीलो अर बड़ी मात्रा में है। चारणां, सोढां, राजपूतां, मेघवाळां अर दूजी जातियां में राजस्थानी री मारवाड़ी बोली रो चलण है। उमरकोट सोढा राजपूतां री रियासत रीवी है। ओ सांच है कै राजनीतिक सीमांकन सांस्कृतिक कड़ियां नीं तोड़ सकै।