Wp/mag/मोक्ष

मोक्ष एक दार्शनिक शब्द है जे हिन्दु, बौद्ध, जैन आउ सिखधर्ममे प्रमुखतासे आवऽहै जेकर अर्थ है मोहके क्षय होएल । मोक्षके बारेमे बतावेवाला मुख्य हिन्दु दर्शन, बौद्ध दर्शन, जैन दर्शन, भारतीय दर्शन है ।

शास्त्रकार जीवनके चार उद्देश्य बतौलन हे— धर्म, अर्थ, काम आउ मोक्ष । एकरामे से मोक्ष परम अभीष्ट अथवा 'परम पुरूषार्थ' कहल गेलै हे । मोक्षके प्राप्तिके उपाय आत्मतत्व या ब्रह्मतत्वके साक्षात् करेला बतलावल गेलै हे । न्यायदर्शनके अनुसार दुःखके आत्यन्तिक नाशे मुक्ति या मोक्ष है । साङ्ख्यके मतसे तीनो प्रकारके तापके समूल नाशे मुक्ति या मोक्ष है । वेदान्तमे पूर्ण आत्मज्ञान द्वारा मायासम्बन्धसे रहित होके अपन शुद्ध ब्रह्मस्वरूपके बोध प्राप्त कैल मोक्ष है । तात्पर्य ई है कि सब प्रकारके सुख दुःख आउ मोह आदिके छूट जाएले मोक्ष है ।
मोक्षके कल्पना स्वर्ग-नरक आदिके कल्पनासे पीछेके है आउ ओकर अपेक्षा विशेष संस्कृत एवं परिमार्जित है । स्वर्गलोकके कल्पनामे ई आवश्यक है कि मनुष्य अपन कैल पुण्य वा शुभ कर्मके फल भोगेके उपरान्त फिर ई संसारमे आके जन्म ले; एकरासे ओकरा फिर अनेक प्रकारके कष्ट भोगे पड़तै । पर मोक्षके कल्पनामे ई बात न ।
भारतीय दर्शनमे नश्वरताके दुःखके कारण मानल गेलै हे । संसार आवागमन, जन्म-मरण आउ नश्वरताके केन्द्र है । ई अविद्याकृत प्रपञ्चसे मुक्ति पाएले मोक्ष है । प्रायः सब दार्शनिक प्रणाली संसारके दुःखमय स्वभावके स्वीकार कैलकै हे आउ एकरासे मुक्त होवेला कर्ममार्ग या ज्ञानमार्गके रस्ता अपनौलकै हे । मोक्ष ई प्रकारके जीवनके अन्तिम परिणति है । एकरा पारपार्थिक मूल्य मानके जीवनके परम उद्देश्यके रूपमे स्वीकार कैल गेलै हे । मोक्षके वस्तुसत्यके रूपमे स्वीकार कैल कठिन है । फलतः सब प्रणालीमे मोक्षके कल्पना प्रायः आत्मवादी है । अन्ततोगत्वा ई एक वैयक्तिक अनुभूतिए सिद्ध हो पावऽहै ।
सबसे पहिले त पुण्य या पापसे मुक्ति न भेँटै । पुण्य आउ पाप दुनहीँ कर्म बन्धनमे बान्धेवाला है, दुनोके अभावे मोक्ष है । एकराला आवश्यक है कि पुण्य अथवा पापके प्रति आसक्ति रखले बिना प्राकृतिक रूपसे कर्म करैत चलेला है । जौन प्रकारसे नदीके प्रवाहमे पड़ल पत्ताके कौनो स्वतन्त्र इच्छा न होवै अपितु ऊ जलेके प्रवाहके समान गतिशील होवऽहै, ओही प्रकार व्यक्तियो अपन स्वतन्त्र शुभाशुभ इच्छाके परित्याग करके यदि केवल कर्तव्य कर्मके प्रति आचरण करै, त ओकर कर्म बन्धनके धीरे-धीरे स्वतः लोप हो जा है आउ एही क्रम मुक्तिके प्रथम सोपान है ।
यद्यपि विभिन्न प्रणाली अपन-अपन ज्ञानमीमांसाके अनुसार मोक्षके अलगे-अलगे कल्पना कैलकै हे, तथापि अज्ञान, दुःखसे मुक्त हो सकऽहै । एकरा जीवनमुक्ति कहबै । किन्तु कुछ प्रणाली, जेकरामे न्याय, वैशेषिक एवं विशिष्टाद्वैत उल्लेखनीय है; जीवनमुक्तिके सम्भावनाके अस्वीकार करऽहै । दोसर रूपके "विदेहमुक्ति" कहऽहै । जेकर सुख-दुःखके भाव सबके विनाश हो गेलै हो, ऊ देह त्यागेके बाद आवागमनके चक्रसे सर्वदाला मुक्त हो जा है । ओकरा निग्रहवादी मार्गके अनुसरण करे पड़ऽहै । उपनिषद् मे आनन्दके स्थितिएके मोक्षके स्थिति कहल गेलै हे, काहेकि आनन्दमे सब द्वन्द्व के विलय हो जा है । ई अद्वैतानुभूति के स्थिति है । एही जीवनमे एकरा अनुभव कैल जा सकऽहै । वेदान्तमे मुमुक्षुके श्रवण, मनन एवं निधिध्यासन, ई तीन प्रकारके मानसिक क्रिया करे पड़ऽहै । ई प्रक्रियामे नानात्व, का, जे अविद्याकृत है, विनाश होवऽहै आउ आत्मा, जे ब्रह्मस्वरूप है, ओकर साक्षात्कार होवऽहै । मुमुक्षु "तत्वमसि" से "अहम्ब्रह्यास्मि" दन्ने बढ़ऽहै । एहाँ आत्मसाक्षात्कारेके मोक्ष मानल गेलै हे । वेदान्तमे ई स्थिति जीवनमुक्तिके स्थिति है । मृत्यूपरान्त ऊ ब्रह्ममे विलीन हो जा है । ईश्वरवादमे ईश्वरके सान्निध्ये मोक्ष है । अन्य दोसर वादमे संसारसे मुक्तिए मोक्ष है । लोकायतमे मोक्षके अस्वीकार कैल गेलै हे ।
इहो देखी
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