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Wp/mag/बौद्ध दर्शन

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महात्मा बुद्ध

बौद्ध दर्शन (श्रावक - संस्कृत) या सावक (पाली) के अर्थ है "सुनेवाला" या अधिक सामान्यतः, "शिष्य" । ई शब्दके प्रयोग बौद्धधर्म आउ जैनधर्ममे कैल जा है ।' से अभिप्राय ऊ दर्शन से है जे महात्मा बुद्धके निर्वाणके बाद बौद्धधर्मके विभिन्न सम्प्रदाय द्वारा विकसित कैल गेलै आउ बादमे पूरा एशियामे ओकर प्रसार होलै । 'दुःख से मुक्ति' बौद्धधर्मके सदासे मुख्य ध्येय रहलै हे । मैत्री, करुणा, मुदिता आउ उपेख्खा ई चार ब्रह्म विहार बौद्धधर्मके साधन है । आर्य आष्टाङ्गिक मार्गके द्वारा जीवनके ध्येय प्रस्फुटित होव है ।

बुद्धके उपदेश तीन पिटकमे सङ्कलित है । ई सुत्त पिटक, विनय पिटक आउ अभिधम्म पिटक कहला है । ई सब पिटक बौद्धधर्मके आगम है । क्रियाशील सत्यके धारणा बौद्ध मतके मौलिक विशेषता है । उपनिषदके ब्रह्म अचल आउ अपरिवर्तनशील है । बुद्धके अनुसार परिवर्तने सत्य है । पश्चिमी दर्शनमे हैराक्लाइटस आउ बर्गसोँ परिवर्तनके सत्य मानलन । ई परिवर्तनके कोनो अपरिवर्तनीय आधारो न है । बाह्य आउ आन्तरिक जगत् मे कोनो ध्रुव सत्य न है । बाह्य पदार्थ "स्वलक्षण" के सङ्घात है । आत्मो मनोभाव आउ विज्ञानके धारा है । ई प्रकार बौद्धमतमे उपनिषदके आत्मवादके खण्डन करके "अनात्मवाद" के स्थापना कैल गेलै हे । तैयो बौद्धमतमे कर्म आउ पुनर्जन्म मान्य है । आत्माके न मानहुँ पर बौद्धधर्म करुणासे ओतप्रोत है । दुःखसे द्रवित होइएके बुद्ध संन्यास लेलन आउ दुःखके निरोधके उपाय खोजलन । अविद्या, तृष्णा आदिमे दुःखके कारण खोजके ऊ एकर उच्छेदके निर्वाणके मार्ग बतावलन ।

सम्पूर्ण एशियाके देशमे बौद्धधर्मके प्रसार होलै । बुद्धके अनुयायीमे मतभेदके कारण ढेर सम्प्रदाय बन गेलै । जे स्थविरवाद आउ महायानके रूपमे विकसित होलै ।

सिद्धान्तभेदके अनुसार बौद्ध परम्परामे चार दर्शन प्रसिद्ध है । एकरामे वैभाषिक आउ सौत्रान्तिक मत हीनयान परम्परामे है । ई दक्षिणी बौद्धमत है । एकर प्रचारो लङ्कामे है । योगाचार आउ माध्यमिक मत महायान परम्परामे है । ई उत्तरी बौद्धमत है । ई चारो दर्शनके उदय ईसाके आरम्भिक शब्ताब्दीमे होलै । एही समय वैदिक परम्परामे षड्दर्शनके उदय होलै । ई प्रकार भारतीय परम्परामे दर्शन सम्प्रदायके आविर्भाव लगभग एके साथे होलै हे तथा उनकर विकास परस्पर विरोधके द्वारा होलै हे । पश्चिमी दर्शनके भाँति ई सब दर्शन पूर्वापर क्रममे उदित न होलै हे ।

वसुबन्धु (४०० ई), कुमारलात (२०० ई) मैत्रेय (३०० ई) आउ नागार्जुन (२०० ई) ई सब दर्शनके प्रमुख आचार्य हलन । वैभाषिक मत बाह्य वस्तुके सत्ता तथा स्वलक्षणके रूपमे ओकर प्रत्यक्ष मान है । अतः ओकरा बाह्य प्रत्यक्षवाद अथवा "सर्वास्तित्ववाद" कहल जा है । सैत्रान्तिक मत के अनुसार पदार्थके प्रत्यक्ष न, अनुमान होव है । अतः ओकरा बाह्यानुमेयवाद कहल जा है । योगाचार मत के अनुसार बाह्य पदार्थके सत्ता न । हमनीके जे कुछ लोक है ऊ विज्ञान मात्र है । योगाचार मत विज्ञानवाद कहला है । माध्यमिक मत के अनुसार विज्ञानो सत्य न है । सब कुछ शून्य है । शून्यके अर्थ निरस्वभाव, निःस्वरूप अथवा अनिर्वचनीय है । शून्यवादके ई शून्य वेदान्तके ब्रह्मके बड़ी निकट आ जा है ।

संक्षिप्त परिचय

बौद्ध दर्शन अपन प्रारम्भिक कालमे जैन दर्शने नियन आचारशास्त्रके रूपेमे हलै । बादमे बुद्धके उपदेशके आधार पर विभिन्न विद्वान एकरा आध्यात्मिक रूप देके एक सशक्त दार्शनिकशास्त्र बनावलन । बुद्ध द्वारा सर्वप्रथम सारनाथमे देल उपदेशमे से चार आर्यसत्य ई प्रकार है - ‘दुःखसमुदायनिरोधमार्गाश्चत्वारआर्यबुद्धस्याभिमतानि तत्त्वानि ।’ अर्थात् -

  1. दुःख - संसार दुखमय है
  2. दुःखसमुदाय दर्शन - दुख उत्पन्न होवेके कारण है (तृष्णा)
  3. दुःखनिरोध - दुखके निवारण सम्भव है
  4. दुःखनिरोधमार्ग - दुख निवारक मार्ग (आष्टाङ्गिक मार्ग)

बुद्धाभिमत ई चारो तत्त्वमे से दुःखसमुदायके अन्तर्गत द्वादशनिदान (जरामरण, जाति, भव, उपादान, तृष्णा, वेदना, स्पर्श, षडायतन, नामरूप, विज्ञान, संस्कार तथा अविद्या) तथा दुःखनिरोधके उपायमे अष्टाङ्गमार्ग (सम्यक् दृष्टि, सम्यक् सङ्कल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कर्म, सम्यक् आजीव, सम्यक् प्रयत्न, सम्यक् स्मृति तथा सम्यक् समाधि) के विशेष महत्व है । एकर अतिरिक्त पञ्चशील (अहिंसा, अस्तेय, सत्यभाषण, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह) एवं द्वादश आयतन (पञ्च ज्ञानेन्द्री, पञ्च कर्मेन्द्री, मन आउ बुद्धि), जेकरासे सम्यक् कर्म करेके चाही - एहु आचारके दृष्टिसे महनीय है । वस्तुतः चार आर्य सत्यके विशद विवेचने बौद्ध दर्शन है ।

बौद्ध दर्शनके प्रारम्भिक श्रेणी विभाग, सत्ताके महत्त्वपूर्ण प्रश्नके लेके कैल गेलै जेकि चार प्रस्थानके रूपमे ई प्रकार जानल जा है -

मुख्यो माध्यमिको विवर्तमखिलं शून्यस्य मेने जगत्
योगाचारमते तु सन्ति मतयस्तासां विवर्तोऽखिलः ।
अर्थोऽस्ति क्षणिकस्त्वसावनुमितो बुद्धयेति सौत्रान्तिकः
प्रत्यक्षं क्षणभंगुरं च सकलं वैभाषिको भाषते ॥

वैभाषिक सम्प्रदाय (बाह्यार्थ प्रत्यक्षवाद)

ई अर्थके ज्ञानसे युक्त अर्थात् प्रत्यक्षगम्य मानल जा है ।

सौत्रान्तिक सम्प्रदाय (बाह्यार्थानुमेयवाद)

ई बाह्यार्थके अनुमेय मानल जा है । यद्यपि बाह्यजगत के सत्ता दुनो स्वीकार कर है किन्तु दृष्टिके भेदसे एकला चित्त निरपेक्ष आउ दुसरला चित्त सापेक्ष अर्थात् अनुमेय सत्ता है । सौत्रान्तिक मतमे सत्ताके स्थिति बाह्यसे अन्तर्मुखी है ।

योगाचार सम्प्रदाय (विज्ञानवाद)

एकरा अनुसार बुद्धिए आकारके साथे है अर्थात् बुद्धिएमे बाह्यार्थ चल आव है । चित्त अर्थात् आलयविज्ञान मे अनन्त विज्ञानके उदय होवित रह है । क्षणभङ्गिनी चित्त सन्ततिके सत्तासे सब वस्तुके ज्ञान होव है । वस्तुतः ई बाह्य सत्ताके सर्वथा निराकरण कर है । एकर एहाँ माध्यमिक मतके समान सत्ता दु प्रकारके मानल गेलै हे -

  • क) पारमार्थिक
  • ख) व्यावहारिक ।

व्यावहारिकमे पुनश्च परिकल्पित आउ परतन्त्र दु रूप ग्राह्य है । एहाँ चित्तेके प्रवृत्ति तथा निवृत्ति (निरोध, मुक्ति) होव है । सब वस्तु चित्तेके विकल्प है । एकरे आलयविज्ञान कहल जा है । ई आलयविज्ञान क्षणिक विज्ञानके सन्तति मात्र है ।

माध्यमिक सम्प्रदाय (शून्यवाद)

एहाँ बाह्य एवम् अन्तः दुनो सत्ताके शून्यमें विलयन होलै हे जेकि अनिर्वचनीय है । ई केवल ज्ञानेके अपनामे स्थित मान है आउ दु प्रकारके सत्य स्वीकार कर है-

  • क) सांवृत्तिक सत्य - अविद्याजनित व्यावहारिक सत्ता।
  • ख) पारमार्थिक सत्य - प्रज्ञाजनित सत्य

बौद्धके ई चारो सम्प्रदायमे से प्रथम दुके सम्बन्ध हीनयानसे तथा अन्तिम दुनोके सम्बन्ध महायानसे है । हीनयानी सम्प्रदाय यथार्थवादी तथा सर्वास्तिवादी है, जखनिकि महायानी सम्प्रदायमे से योगाचारी विचारेके परम तत्त्व तथा परम रूपमे स्वीकार कर है । माध्यमिक दर्शन एक निषेधात्मक एवं विवेचनात्मक पद्धति है । एही कारण है कि माध्यमिक शून्यवादके 'सर्ववैनाशिकवाद' के नामोसे जानल जा है ।

हीनयान आउ महायानके अन्यान्य अनेक शाखा है जेकि प्रख्यात न है -

क्षणिकवाद

बौद्धके अनुसार वस्तुके निरन्तर परिवर्तन होवित रह है आउ कोनो पदार्थ एक क्षणसे अधिक स्थायी न रह है । कोनो मनुष्य कोनो दु क्षणमे एक नियन न रह सकै । एहीसे आत्मो क्षणिक है आउ ई सिद्धान्त क्षणिकवाद कहला है । एकराला बौद्ध मतानुयायी प्रायः दीपशिखाके उपमा दे हथिन । जखनि तक दीपक जल है तखनि तक ओकर लौ एके शिखा प्रतीत होव है । जखनिकि ई शिखा अनेक शिखाके एखो श्रृङ्खला है । एक बून्दसे उत्पन्न शिखा दुसर बून्दसे उत्पन्न शिखासे भिन्न है किन्तु शिखा सबके निरन्तर प्रवाहसे एकताके भान होव है । एही प्रकार सांसारिक पदार्थ क्षणिक है किन्तु ओकरामे एकताके प्रतीति होव है । ई प्रकार ई सिद्धान्त ‘नित्यवाद’ आउ ‘अभाववाद’ के बीचके मध्यम मार्ग है ।

प्रतीत्यसमुत्पाद

‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ से तात्पर्य एक वस्तुके प्राप्त होवे पर दुसर वस्तुके उत्पत्ति अथवा एक कारणके आधार पर एक कार्यके उत्पत्तिसे है । प्रतीत्यसमुत्पाद सापेक्षो है आउ निरपेक्षो । सापेक्ष दृष्टिसे ऊ संसार है आउ निरपेक्ष दृष्टिसे निर्वाण । ई क्षणिकवाद नियन शाश्वतवाद आउ उच्छेदवादके मध्यके मार्ग है; एहीसे एकरा मध्यममार्ग कहल जा है आउ एकरा मानेवाला माध्यमिक ।

बुद्ध दुःखके कारणके व्याख्या करेला कार्य कारण सिद्धान्तके प्रतिपादन कैलन । बुद्धके कार्य कारण सिद्धान्तके प्रतीत्यसमुत्पाद कहल जा है । प्रतीत्यसमुत्पादमे बुद्ध १२ कार्य-कारणके एक श्रृङ्खला प्रस्तुत कर हथिन जेकरा द्वादश निदान कहल जा है । ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ के शाब्दिक अर्थ- प्रतीत्य = एकके अपेक्षासे + समुत्पाद = दुसरके उत्पत्ति । अर्थात् एकके होवे पर दुसरके उत्त्पतिए ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ है । जैसे- दीपकके होवे पर लौ के उत्पत्तिए ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ है, जेकरामे दीपक 'कारण' है आउ लौ 'कार्य' । "एक वस्तुके होवे पर दुसर वस्तुके उत्पत्ति" एकरा "आश्रित उत्पत्तिके सिद्धांत" एहु कहल जा है । #रिज डेविस- "यदि ऊ है त ई है, ओकर उदयसे एकर उदय" ।

  • ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ बौद्ध दर्शनके केन्द्रीय सिद्धान्त है ।
  • प्रत्येक कार्यके उत्पत्ति कोनो न कोनो कारणेसे होव है ।
  • कारण न होवे पर कार्यो उत्पन्न न होवै ।
  • संसारके प्रत्येक घटना सकारण है ।

ई चक्रके बारह क्रम है जे एक दुसराके उत्पन्न करेके कारण है; ई है -

  1. अविद्या
  2. संस्कार
  3. विज्ञान
  4. नाम-रूप
  5. षडायतन
  6. स्पर्श
  7. वेदना
  8. तृष्णा
  9. उपादान
  10. भव
  11. जाति
  12. जरा-मरण ।

एकरो देखथिन

प्रमुख बौद्ध दार्शनिक

बाहरी कड़ी

सन्दर्भ