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हिन्दुधर्म
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प्रवेशद्वार:हिन्दुधर्म

हिन्दु मापनप्रणाली

पुराण हिन्दुके धर्म-सम्बन्धी आख्यान ग्रन्थ है, जेकरामे संसार - ऋषि - राजाके वृत्तान्त आदि है । ई वैदिक कालके बड़ी समय बादके ग्रन्थ है । भारतीय जीवन-धारामे जौन ग्रन्थके महत्त्वपूर्ण स्थान है ओकरामे पुराण प्राचीन भक्ति-ग्रन्थके रूपमे बड़ी महत्त्वपूर्ण मानल जा है । अठारह पुराणमे अलग-अलग देवी-देवताके केन्द्र मानके पाप आउ पुण्य, धर्म आउ अधर्म, कर्म आउ अकर्मके गाथा कहल गेलै हे । कुछ पुराणमे सृष्टिके आरम्भसे अन्त तकके विवरण देल गेलै हे ।

'पुराण' के शाब्दिक अर्थ है, 'प्राचीन' या 'पुराना' ।[1] पुराणके रचना मुख्यतः संस्कृतमे होलै हे, किन्तु कुछ पुराण क्षेत्रीयो भाषामे रचल गेलै हे ।[2][3] हिन्दु आउ जैन दुनही धर्मके वाङ्मयमे पुराण मिलऽ है । [2]

पुराणमे वर्णित विषयके कौनो सीमा न है । एकरामे ब्रह्माण्डविद्या, देवी-देवता, राजा, नायक, ऋषि-मुनिके वंशावली, लोककथा, तीर्थयात्रा, मन्दिर, चिकित्सा, खगोलशास्त्र, व्याकरण, खनिज विज्ञान, हास्य, प्रेमकथाके साथे-साथे धर्मशास्त्र आउ दर्शनोके वर्णन है । [3] विभिन्न पुराणके विषय-वस्तुमे बड़ी अधिक असमानता है । एत्ते न, एके पुराणके ढेर-ढेर पाण्डुलिपि प्राप्त होलै हे जे परस्पर भिन्न-भिन्न है । [2] हिन्दु पुराणके रचनाकार अज्ञात है आउ ऐसन लगऽ है कि ढेर रचनाकार ढेर शताब्दीमे इनकर रचना कैलन हे । एकर विपरीत जैन पुराण है । जैन पुराणके रचनाकाल आउ रचनाकारके नाम बतावल जा सकहै ।[2]

कर्मकाण्ड (वेद) से ज्ञान (उपनिषद्) दन्ने आवैत भारतीय मानसमे पुराणके माध्यमसे भक्तिके अविरल धारा प्रवाहित होलै हे । विकासके एही प्रक्रियामे बहुदेववाद आउ निर्गुण ब्रह्मके स्वरूपात्मक व्याख्यासे धीरे-धीरे मानस अवतारवाद या सगुण भक्ति दन्ने प्रेरित होलै । छोट आउ बड़के भेदसे अठारह पुराण बतावल गेलै हे ।

१. ब्रह्मपुराण, २. पद्मपुराण, ३. विष्णुपुराण, ४. शिवपुराण, ५. भागवतपुराण, ६. भविष्यपुराण, ७. नारदपुराण, ८. मार्कण्डेयपुराण, ९. अग्निपुराण, १०. ब्रह्मवैवर्तपुराण, ११. लिंगपुराण, १२. वाराहपुराण, १३. स्कन्दपुराण, १४. वामनपुराण, १५. कूर्मपुराण, १६. मत्स्यपुराण, १७. गरुडपुराण आउ १८. ब्रह्माण्डपुराण[4]

पुराणमे वैदिककालसे चलैत आवैत सृष्टि आदि सम्बन्धी विचार, प्राचीन राजा आउ ऋषिके परम्परागत वृत्तान्त एवं कहानी आदिके संग्रहके साथे साथे कल्पित कथाके विचित्रता आउ रोचक वर्णन द्वारा साम्प्रदायिक या साधारण उपदेशो मिलऽ है ।

विष्णु, ब्राम्हण, वायु, मत्स्य आउ भागवत आदि पुराणमे ऐतिहासिक वृत्त— राजाके वंशावली आदिके रूपमे बड़ी कुछ मिलऽ है । ई वंशावली यद्यपि बहुत संक्षिप्त है आउ एकरामे परस्पर कहुँ-कहुँ विरोधो है, पर है बडे कामके । पुराण दन्ने ऐतिहासिक इधर विशेष रूपसे ध्यान देलन हे आउ ऊ ई सब वंशावलीके छानबीनमे लगन हथिन ।

पुराणके लक्षण

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'पुराण' के शाब्दिक अर्थ है - 'प्राचीन आख्यान' या 'पुरान कथा' । ‘पुरा’ शब्दके अर्थ है - अनागत एवं अतीत । ‘अण’ शब्दके अर्थ होवऽ है - कहल या बतलावल । रघुवंशमे पुराण शब्दके अर्थ है "पुराण पत्रापग मागन्नतरम्" एवं वैदिक वाङ्मयमे "प्राचीनः वृत्तान्तः" देल है ।

सांस्कृतिक अर्थसे हिन्दु संस्कृतिके ऊ विशिष्ट धर्मग्रन्थ जेकरामे सृष्टिसे लेके प्रलय तकके इतिहास-वर्णन शब्दसे कैल गेल होवे, पुराण कहल जा है । पुराण शब्दके उल्लेख वैदिक युगके वेद सहित आदितम साहित्योमे पाएल जा है अतः ई सबसे पुरातन (पुराण) मानल जा सकऽ है । अथर्ववेदके अनुसार "ऋचः सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह ११.७.२") अर्थात् पुराणके आविर्भाव ऋक्, साम, यजुस् औद छन्दके साथहीँ होलै हल । शतपथ ब्राह्मण (१४.३.३.१३) मे त पुराणवाग्ङमयके वेदे कहल गेलै हे । छान्दोग्य उपनिषदो (इतिहास पुराणं पंचम वेदानांवेदम् ७.१.२) पुराणके वेद कहकै हे । बृहदारण्यकोपनिषद् एवं महाभारतमे कहल गेलै हे कि "इतिहास पुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत्" अर्थात् वेदके अर्थविस्तार पुराणके द्वारा करेके चाही । एकरासे ई स्पष्ट है कि वैदिक कालमे पुराण एवं इतिहासके समान स्तर पर रखल गेलै हे ।

अमरकोष आदि प्राचीन कोशमे पुराणके पाँच लक्षण मानल गेलै हे : सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग (प्रलय, पुनर्जन्म), वंश (देवता आउ ऋषि सूची), मन्वन्तर (चौदह मनुके काल), आउ वंशानुचरित (सूर्य चन्द्रादि वंशीय चरित) ।

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च ।
वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥
  • () सर्ग – पञ्चमहाभूत, इन्द्रियगण, बुद्धि आदि तत्त्वके उत्पत्तिके वर्णन,
  • () प्रतिसर्ग – ब्रह्मादिस्थावरान्त सम्पूर्ण चराचर जगत् के निर्माणके वर्णन,
  • () वंश – सूर्यचन्द्रादि वंशके वर्णन,
  • () मन्वन्तर – मनु, मनुपुत्र, देव, सप्तर्षि, इन्द्र आउ भगवान् के अवतारके वर्णन,
  • () वंशानुचरित – प्रति वंशके प्रसिद्ध पुरुषके वर्णन ।

मानल जा है कि सृष्टिके रचनाकर्ता ब्रह्माजी सर्वप्रथम जौन प्राचीनतम धर्मग्रन्थके रचना कैलन, ओकरा पुराणके नामसे जानल जा है ।

रक्तबीजासुरके साथे युद्धला तैयार दुर्गा, मार्कण्डेयपुराण

प्राचीनकालसे पुराण देवता, ऋषि, मनुष्य - सबके मार्गदर्शन करैत रहलन हे । पुराण मनुष्यके धर्म एवं नीतिके अनुसार जीवन व्यतीत करेके शिक्षा दे है । पुराण मनुष्यके कर्मके विश्लेषण करके ओकरा दुष्कर्म करेसे रोकहै । पुराण वस्तुतः वेदके विस्तार है । वेद बड़ी जटिल एवं शुष्क भाषा-शैलीमे लिखल गेल है । लोमहर्ष आउ उनकर पुत्र उग्रश्रव पुराणके रचना आउ पुनर्रचना कैलन हे कहेसे जादे सही रहतै कि इनकर द्वारा पुराणके संकलन कैल गेल है चूँकि प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्परा श्रुति पर आधारित हल जौन प्रकार वेद व्यासजी ऋग्वेदके संकलन कैलन ओही प्रकार लोमहर्ष आउ उग्रश्रव पुराणके संकलन कैलन । कहल जा है, ‘‘पूर्णात् पुराण ’’ जेकर अर्थ है, जे वेदके पूरक होवे, अर्थात् पुराण (जे वेदके टीका है) ।[उद्धरण चाही] वेदके जटिल भाषामे कहल गेल बातके पुराणमे सरल भाषामे समझावल गेल है । पुराण-साहित्यमे अवतारवादके प्रतिष्ठित कैल गेल है । निर्गुण निराकारके सत्ताके मानैत सगुण साकारके उपासना कैल ई सब ग्रन्थके विषय है । पुराणमे अलग-अलग देवी-देवताके केन्द्रमे रखके पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म आउ कर्म-अकर्मके कहानी है । प्रेम, भक्ति, त्याग, सेवा, सहनशीलता ऐसन मानवीय गुण है, जिनकर अभावमे उन्नत समाजके कल्पना न कैल जा सकै । पुराणमे देवी-देवताके अनेक स्वरूपके लेके एक विस्तृत विवरण मिलहै । पुराणमे सत्यके प्रतिष्ठाके अतिरिक्त दुष्कर्मके विस्तृत चित्रणो पुराणकार कैल है । पुराणकार देवताके दुष्प्रवृत्तिके व्यापक विवरण देल है किन्तु मूल उद्देश्य सद्भावनाके विकास आउ सत्यके प्रतिष्ठे है ।

खाली ६ पुराण -- मत्स्य, वायु, विष्णु, ब्रह्माण्ड, भविष्य एवं भागवतेमे राजाके वंशावली पाएल जा है ।

अष्टादश पुराण

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पुराणके संख्या प्राचीन कालसे अठारह मानल गेलै हे । पुराणमे एक विचित्रता ई है कि प्रायः प्रत्येक पुराणमे अठारह पुराणके नाम आउ उनकर श्लोक-संख्याके उल्लेख है ।[5] देवीभागवतमे नामके आरम्भिक अक्षरके निर्देशानुसार १८ पुराणके गणना ई प्रकार कैल गेलै हे -

मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम् ।
अनापलिंगकूस्कानि पुराणानि पृथक्पृथक् ॥[6]

म-२, भ-२, ब्र-३, व-४।
अ-१,ना-१, प-१, लिं-१, ग-१, कू-१, स्क-१ ॥

'विष्णुपुराण' के अनुसार अठारह पुराणके नाम ई प्रकार है —‌ ब्रह्म, पद्म, विष्णु, शैव (वायु), भागवत, नारद, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, लिङ्ग, वाराह, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड आउ ब्रह्माण्ड । क्रमपूर्वक नाम-गणनाके उपरान्त श्रीविष्णुपुराणमे इनकाला स्पष्टतः 'महापुराण' शब्दोके प्रयोग कैल गेलै हे ।[7] श्रीमद्भागवत[8], मार्कण्डेय[9] एवं कूर्मपुराणोमे[10] एही नाम एवं एही क्रम है । अन्य पुराणोमे 'शैव' आउ 'वायु' के भेद छोड़के नाम प्रायः सब जगह समान है, श्लोक-संख्यामे कहुँ-कहुँ कुछ भिन्नता है ।[11] नारद पुराण[12], मत्स्य पुराण[13] आउ देवीभागवतमे 'शिव पुराण' के स्थानमे 'वायुपुराण' के नाम है । भागवतके नामसे आजकल दु पुराण मिलहै—एक 'श्रीमद्भागवत', दोसर 'देवीभागवत' । ई दुनोमे कौन वास्तवमे महापुराण है, एकरा पर विवाद रहलै हे । नारद पुराणमे सब अठारह पुराणके नाम निर्देशके अतिरिक्त ऊ सबके विषय-सूचियो देल गेलै हे[14], जे पुराणके स्वरूप-निर्देशके दृष्टिसे अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है । बहुमतसे अठारह पुराणके नाम ई प्रकार है:

  1. ब्रह्मपुराण
  2. पद्मपुराण
  3. विष्णुपुराण -- (उत्तर भाग - विष्णुधर्मोत्तर)
  4. वायुपुराण -- (भिन्न मतसे - शिव पुराण)
  5. भागवत् पुराण -- (भिन्न मतसे - देवीभागवत पुराण)
  6. नारद पुराण
  7. मार्कण्डेय पुराण
  8. अग्नि पुराण
  9. भविष्य पुराण
  10. ब्रह्मवैवर्त पुराण
  11. लिङ्गपुराण
  12. वाराह पुराण
  13. स्कन्द पुराण
  14. वामन पुराण
  15. कूर्मपुराण
  16. मत्स्यपुराण
  17. गरुड पुराण
  18. ब्रह्माण्ड पुराण

प्रतीकात्मक सङ्ख्या अठारह, व्यावहारिक सङ्ख्या एक्कैस

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आचार्य बलदेव उपाध्याय पर्याप्त तर्कके आधार पर सिद्ध कैलन हे कि शिव पुराण वस्तुतः एक उपपुराण है आउ ओकर स्थान पर वायुए पुराण वस्तुतः महापुराण है ।[15] एही प्रकार देवीभागवतो एक उपपुराण है ।[16] किन्तु ई दुनोके उपपुराणके रूपमे स्वीकार करेमे सबसे बड़ बाधा ई है कि स्वयं विभिन्न पुराणमे उपलब्ध अपेक्षाकृत अधिक विश्वसनीय सूचीमे कहुँ ई दुनोके नाम उपपुराणके रूपमे न आएल है । दोसर दन्ने रचना एवं प्रसिद्धि दुनो रूपमे ई दुनहीँ महापुराणमे परिगणित रहलै हे ।[17] पण्डित ज्वाला प्रसाद मिश्र बड़ी पहिले विस्तारसे विचार करेके बावजूद कोई अन्य निश्चयात्मक समाधान न पाके ई कहलन हल कि 'शिव पुराण' आउ 'वायु पुराण' एवं 'श्रीमद्भागवत' आउ 'देवीभागवत' महापुराणे है आउ कल्प-भेदसे अलगे-अलगे समयमे इनकर प्रचलन रहलै हे ।[18] ई बातके आधुनिक दृष्टिसे ई प्रकार कहल जा सकहै कि भिन्न सम्प्रदाय वालाके मान्यतामे ई दुनो कोटिमे से एक न एक गायब रहहै । एही कारणसे महापुराणके संख्या त १८ए रह जा है, किन्तु सम्प्रदाय-भिन्नताके छोड़ देवे पर संख्यामे दुके वृद्धि हो जा है । एही प्रकार प्राचीन एवं रचनात्मक रूपसे परिपुष्ट होवेके बावजूद हरिवंश एवं विष्णुधर्मोत्तरके नामो 'बृहद्धर्म पुराण' के अपेक्षाकृत पश्चात्कालीन[19] सूचीके छोड़के पुराण या उपपुराणके कौनो प्रामाणिक सूचीमे न आवहै । हालाँकि ई दुनोके कारण स्पष्टे है । 'हरिवंश' वस्तुतः स्पष्ट रूपसे महाभारतके खिल (परिशिष्ट) भागके रूपमे रचित है आउ एही प्रकार 'विष्णुधर्मोत्तरो' विष्णु पुराणके उत्तरेभागके रूपमे रचित एवं प्रसिद्ध है ।[20] नारद पुराणमे बाकायदा विष्णु पुराणके विषय सूची देइत 'विष्णुधर्मोत्तर' के ओकर उत्तरभाग बताके एक साथे विषय सूची देल गेलै हे[21][22] आउ स्वयं 'विष्णुधर्मोत्तर' के अन्तके पुष्पिकामे ओकर उल्लेख 'श्रीविष्णुमहापुराण' के 'द्वितीय भाग' के रूपमे कैल गेलै हे ।[23][24] अतः 'हरिवंश' त महाभारतके अंग होवेसे स्वतः पुराणके गणनासे हट जा है । 'विष्णुधर्मोत्तर' विष्णु पुराणके अंग-रूप होवेके बावजूद नाम एवं रचना-शैली दुनो कारणसे एक स्वतन्त्र पुराणके रूपमे स्थापित हो चुकल है । अतः प्रतीकात्मक रूपसे महापुराणके सङ्ख्या अठारह होवेके बावजूद व्यावहारिक रूपमे 'शिव पुराण', 'देवीभागवत' एवं 'विष्णुधर्मोत्तर' के मिलाके महापुराणके संख्या एक्कैस होवहै ।

उपपुराण

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  1. आदि पुराण (सनत्कुमार द्वारा कथित)
  2. नरसिंह पुराण
  3. नन्दिपुराण (कुमार द्वारा कथित)
  4. शिवधर्म पुराण
  5. आश्चर्य पुराण (दुर्वासा द्वारा कथित)
  6. नारदीय पुराण (नारद द्वारा कथित)
  7. कपिल पुराण
  8. मानव पुराण
  9. उशना पुराण (उशनस्)
  10. ब्रह्माण्ड पुराण
  11. वरुण पुराण
  12. कालिका पुराण
  13. माहेश्वर पुराण
  14. साम्ब पुराण
  15. सौर पुराण
  16. पाराशर पुराण (पराशरोक्त)
  17. मारीच पुराण
  18. भार्गव पुराण
  19. विष्णुधर्म पुराण
  20. बृहद्धर्म पुराण
  21. गणेश पुराण
  22. मुद्गल पुराण
  23. एकाम्र पुराण
  24. दत्त पुराण

श्लोक सङ्ख्या

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सुखसागरके अनुसारः

पुराणश्लोकके सङ्ख्या
ब्रह्मपुराण14000
पद्मपुराण55000
विष्णुपुराण23000
शिवपुराण24000
श्रीमद्भावतपुराण18000
नारदपुराण25000
मार्कण्डेयपुराण9000
अग्निपुराण15000
भविष्यपुराण14500
ब्रह्मवैवर्तपुराण18000
लिङ्गपुराण11000
वाराहपुराण24000
स्कन्दपुराण810100
वामनपुराण10000
कूर्मपुराण17000
मत्सयपुराण14000
गरुड़पुराण19000
ब्रह्माण्डपुराण12000

जैनपुराण

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जैन परम्परामे ६३ शलाकापुरुष मानल गेलै हे । पुराणमे इनकर कथा एवं धर्मके वर्णन आदि है । प्राकृत, संस्कृत, अपभ्रंश एवं अन्य देशी भाषामे अनेक पुराणके रचना होलै हे । दुनो सम्प्रदायके पुराण-साहित्य विपुल परिमाणमे उपलब्ध है । एकरामे भारतीय इतिहासके महत्वपूर्ण सामग्री मिलहै ।

जैनधर्ममे २४ पुराण त तीर्थकरके नाम पर है; आउओ बड़मनी है जेकरामे तीर्थकरके अलौकिक चरित्र, सब देवतासे उनकर श्रेष्ठता, जैनधर्म सम्बन्धी तत्वके विस्तारसे वर्णन, फलस्तुति, माहात्म्य आदि है । अलग पद्मपुराण आउ हरिवंशो (अरिष्टनेमि पुराण) है ।

मुख्य पुराण है - जिनसेनके 'आदिपुराण' आउ जिनसेन (द्वि.) के 'अरिष्टनेमि' (हरिवंश) पुराण, रविषेणके 'पद्मपुराण' आउ गुणभद्रके 'उत्तरपुराण' । प्राकृत आउ अपभ्रंशो भाषामे ई पुराण उपलब्ध है । भारतके संस्कृति, परम्परा, दार्शनिक विचार, भाषा, शैली आदिके दृष्टिसे ई पुराण बड़ी महत्वपूर्ण है ।

समस्त आगम ग्रन्थके चार भागमे बाँटल गेलै हे -

(१) प्रथमानुयोग
(२) करनानुयोग
(३) चरणानुयोग
(४) द्रव्यानुयोग ।

अन्य ग्रन्थ

  1. षट्खण्डागम,
  2. धवला टीका,
  3. महाधवला टीका,
  4. कसायपाहुड,
  5. जयधवला टीका,
  6. समयसार,
  7. योगसार
  8. प्रवचनसार,
  9. पंचास्तिकायसार,
  10. बारसाणुवेक्खा
  11. आप्तमीमांसा,
  12. अष्टशती टीका,
  13. अष्टसहस्री टीका,
  14. रत्नकरण्ड श्रावकाचार,
  15. तत्त्वार्थसूत्र,
  16. तत्त्वार्थराजवार्तिक टीका,
  17. तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक टीका,
  18. समाधितन्त्र,
  19. इष्टोपदेश,
  20. भगवती आराधना,
  21. मूलाचार,
  22. गोम्मटसार,
  23. द्रव्यसङ्ग्रह,
  24. अकलङ्कग्रन्थत्रयी,
  25. लघीयस्त्रयी,
  26. न्यायकुमुदचन्द्र टीका,
  27. प्रमाणसङ्ग्रह,
  28. न्यायविनिश्चयविवरण,
  29. सिद्धिविनिश्चयविवरण,
  30. परीक्षामुख,
  31. प्रमेयकमलमार्तण्ड टीका,
  32. पुरुषार्थसिद्ध्युपाय
  33. भद्रबाहु संहिता

बौद्धग्रन्थ

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बौद्ध ग्रन्थमे कहुँ पुराणके उल्लेख न है पर तिब्बत आउ नेपालके बौद्ध ९ पुराण मानहथिन जेकरा ऊ नवधर्म कहहथिन —

  1. प्रज्ञापारमिता (न्यायके ग्रन्थ कहेके चाही),
  2. गण्डव्यूह,
  3. समाधिराज,
  4. लङ्कावतार (रावणके मलयागिरि पर जाएल आउ शाक्यसिंहके उपदेशसे बोधिज्ञान लाभ कैल वर्णित है),
  5. तथागतगुह्यक,
  6. सद्धर्मपुण्डरीक,
  7. ललितविस्तर (बुद्धके चरित्र),
  8. सुवर्णप्रभा (लक्ष्मी, सरस्वती, पृथ्वी आदिके कथा आउ उनकर शाक्यसिंहके पूजन)
  9. दशभूमीश्वर

पुराणमे वर्णित विविध विषय

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पुराणमे आयुर्वेद

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पुराणेके माध्यमसे आयुर्वेद चिकित्साके अध्ययनके प्रचार-प्रसार करेके प्रयास कैल गेलै । अनेक पुराणमे निःशुल्क चिकित्सालयके स्थापनासे होवेवाला लाभके प्रशंसा कैल गेलै हे । एकरासे ऊ समय चिकित्सा देखभालके महत्व आउ उनकर प्रति उपलब्ध सुविधाके पता चलहै । हमनी ई जान सकहियै कि ऊ दिन रोगीके दवाई के साथे-साथे भोजनो मुफ्तमे देल जा हलै ।

ऊ दिन आयुर्वेदके प्रगति स्थिर हलै । आयुर्वेदके वेद आउ शास्त्रके अध्ययनके साथे एक अनिवार्य विषयके रूपमे पढ़ावल जा हलै ।

कला एवं शिल्प

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भारतमे चित्रकलाके एक प्राचीन स्रोत विष्णुधर्मोत्तर पुराण है । विष्णुधर्मोत्तर पुराण एक उपपुराण है । एकर 'चित्रसूत्र' नामक अध्यायमे चित्रकलाके महत्व ई प्रकार उल्लिखित है –

कलानां प्रवरं चित्रम् धर्मार्थ काम मोक्षादं ।
माङ्गल्य प्रथम दोतद् गृहे यत्र प्रतिष्ठितम् ॥
(अर्थ - कलामे चित्रकला सबसे ऊँच है जेकरामे धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षके प्राप्ति होवहै । अतः जौन घरमे चित्रके प्रतिष्ठा अधिक रहहै, ओहाँ सदा मंगलके उपस्थिति मानल गेलै हे ।)

अग्निपुराणमे समस्त विद्याके समावेश होवेके कारण अनेक विद्वान एकरा 'भारतीय संस्कतिके विश्वकोश' कहहथिन । एकरामे प्रासाद एवं देवालय निर्माणके सम्पूर्ण जानकारी उल्लिखित है । एकरामे प्राचीन भारतके समस्त परा एवं अपरा विद्याके संकलन है ।

आग्नेय हि पुराणेस्मिन सर्वा विद्याः प्रदर्शिताः

ई प्रकार पौराणिक ग्रन्थमे कला एवं शिल्पके उन्नयनके साक्ष्य दृष्टगत होवहै‌ ।

एकरो देखथिन

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सन्दर्भ

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  1. Merriam-Webster's Encyclopedia of Literature (1995 Edition), Article on Puranas, ISBN 0-877790426 , page 915
  2. 1 2 3 4 John Cort (1993), Purana Perennis: Reciprocity and Transformation in Hindu and Jaina Texts (Editor: Wendy Doniger), State University of New York Press, ISBN 978-0791413821 , pages 185-204
  3. 1 2 Gregory Bailey (2003), The Study of Hinduism (Editor: Arvind Sharma), The University of South Carolina Press, ISBN 978-1570034497 , page 139
  4. संक्षिप्त शिवपुराण, गीता प्रेस गोरखपुर, वायवीयसंहिता (प्रथम खण्ड), प्रथम अध्याय
  5. पुराण-विमर्श, आचार्य बलदेव उपाध्याय, चौखम्बा विद्याभवन, पुनर्मुद्रित संस्करण-२००२, पृष्ठ-७५.
  6. देवीभागवत-३-२; श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण (सानुवाद), प्रथम खण्ड, गीताप्रेस गोरखपुर, प्रथम संस्करण- संवत्-२०६७, पृष्ठ-७५.
  7. श्रीविष्णुपुराण-३-६-२० से २४; श्रीविष्णुपुराण (सानुवाद), गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण- संवत्-२०५८, पृष्ठ-१७७-१७८.
  8. श्रीमद्भागवत-१२-१३-३ से ८; श्रीमद्भागवतमहापुराण (सानुवाद), द्वितीय खण्ड, गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण- संवत्-२०५८, पृष्ठ-८३२.
  9. मार्कण्डेयमहापुराणम्-१३४-८ से११, मार्कण्डेयमहापुराणम् (सानुवाद), अनुवादक- कन्हैयालाल मिश्र, हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग, संस्करण-१९९६, पृष्ठ-५७३-४.
  10. कूर्मपुराण-१-१३से१५; कूर्मपुराण (सानुवाद), गीताप्रेस गोरखपुर, प्रथम संस्करण- संवत्-२०६१, पृष्ठ-२.
  11. पुराण-विमर्श, आचार्य बलदेव उपाध्याय, चौखम्बा विद्याभवन, पुनर्मुद्रित संस्करण-२००२, पृष्ठ-७६-७८.
  12. बृहन्नारदीयपुराणम् (सानुवाद), पूर्वभाग-९२-२६ से २८, अनुवादक- तारिणीश झा, हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग, संस्करण-२०१२, पृष्ठ-९४०.
  13. मत्स्यपुराण-५३-१८; मत्स्यमहापुराण (सानुवाद), गीताप्रेस गोरखपुर, प्रथम संस्करण- संवत्-२०६१, पृष्ठ-२०३.
  14. बृहन्नारदीयपुराणम् (सानुवाद), पूर्वभाग-अध्याय-९२ से १०९; अनुवादक- तारिणीश झा, हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग, संस्करण-२०१२, पृष्ठ-९३८ से ९८७.
  15. पुराण-विमर्श, आचार्य बलदेव उपाध्याय, चौखम्बा विद्या भवन, वाराणसी, पुनर्मुद्रित संस्करण-२००२, पृष्ठ-१०५.
  16. पुराण-विमर्श, आचार्य बलदेव उपाध्याय, चौखम्बा विद्या भवन, वाराणसी, पुनर्मुद्रित संस्करण-२००२, पृष्ठ-१०९-११७.
  17. संस्कृत वाङ्मय का बृहद् इतिहास, त्रयोदश खण्ड (पुराण), संपादक- प्रो॰ गंगाधर पण्डा, उत्तरप्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ, प्रथम संस्करण-२००६, पृष्ठ-२१,२२.
  18. अष्टादशपुराण-दर्पण, पण्डित ज्वाला प्रसाद मिश्र, खेमराज श्रीकृष्णदास, मुम्बई, संस्करण- जुलाई २००५, पृष्ठ-१३९ एवं १९४.
  19. १३मा या १४मा शतीमे बंगालमे प्रणीत । द्रष्टव्य- धर्मशास्त्र का इतिहास, चतुर्थ भाग, डॉ॰ पाण्डुरङ्ग वामन काणे, उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ, तृतीय संस्करण-१९९६, पृष्ठ-४१८.
  20. विष्णुधर्मोत्तरमहापुराणम् (मूल, हिन्दी अनुवाद एवं श्लोकानुक्रमणिका सहित), प्रथम खण्ड, अनुवादक- श्री कपिलदेव नारायण, चौखम्बा संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी, प्रथम संस्करण-२०१५, पृष्ठ-२ (भूमिका) ।
  21. बृहन्नारदीयपुराणम्, पूर्वभागः -९४-१७ से २०; बृहन्नारदीयपुराणम्, भाग-१, अनुवादक- तारिणीश झा, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, संस्करण-२०१२, पृष्ठ-९४६.
  22. संक्षिप्त नारदपुराण, गीताप्रेस गोरखपुर, प्रथम संस्करण- संवत्-२०५७, पृष्ठ-५०५.
  23. विष्णुधर्मोत्तरमहापुराणम् (मूल, हिन्दी अनुवाद एवं श्लोकानुक्रमणिका सहित), तृतीय खण्ड, अनुवादक- श्री कपिलदेव नारायण, चौखम्बा संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी, प्रथम संस्करण-२०१५, पृष्ठ-७४८.
  24. संस्कृत वाङ्मय का बृहद् इतिहास, त्रयोदश खण्ड (पुराण), संपादक- प्रो॰ गंगाधर पण्डा, उत्तरप्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ, प्रथम संस्करण-२००६, पृष्ठ-६५४.

बाहरी कड़ी

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