Wp/mag/पालि साहित्य

पालि साहित्य मे मुख्यतः बौद्धधर्मके प्रवर्तक गौतम बुद्धके उपदेशके सङ्ग्रह है । किन्तु ई कहल कठिन है कि एकर कोनो भाग बुद्धके जीवनकालमे व्यवस्थित या लिखित रूप धारण करकै हल कि न ।
पालि साहित्य
यद्यपि त्रिपिटकेमे कुछ ऐसन उल्लेख मिल है जेकरासे बुद्धके जीवनकालेमे धर्मके कुछ प्रकरणके व्यवस्थित पाठ कैल जाएके पता चल है । उदाहरणार्थ उदानमे वर्णन है कि एक बेर सीण नामक भिक्षुसे स्वयं भगवान् पूछलन कि तु धर्मके कैसे समझले? एकर उत्तरमे ऊ भिक्षु १६ अष्टक वर्गके पूरा स्वरके साथे गाके सुना देलकै । एकर भगवान् प्रशंसो कैलन । विनयपिटक आदि ग्रन्थमे बहुश्रुत, धर्मधर, विनयधर, मातृकाधर आउ पञ्चनेकायिक, भाणक, सुत्तन्तिक नियन विशेषणके प्रयोग मिल है जेकरासे स्पष्ट है कि बुद्धके उपदेशके धारण, पारणके परम्परा उनकर जीवनकालेसे चल पड़लै हल । ई परम्पराके आधार पर बुद्धके उपदेशके सुव्यवस्थित साहित्यिक रूप देवेला तीन बेर सङ्गीतिके जाएके उल्लेख चुल्लवग्ग, दीपवंश, महावंश आदि ग्रन्थमे मिल है ।
प्रथम सङ्गीति बुद्धनिर्वाणके चार मास पश्चाते राजगृहमे होलै जेकरामे ५०० भिक्षु भाग लेलन, जेकरा करण ऊ पञ्चशतिका नामोसे प्रसिद्ध है । एकर अध्यक्षता महाकाश्यप कैलन आउ ऊ बुद्धके साक्षात् शिष्य भिक्षु उपालिसे विनय सम्बन्धी आउ स्थविर आनन्दसे सुत्त सम्बन्धी प्रश्न पूछ-पूछके अन्य भिक्षुके अनुमोदनसे उक्त विषयके सङ्ग्रह कैलन । एही प्रकारके दुसर सङ्गीति बुद्ध निर्वाणके १०० वर्ष पश्चात् वैशालीमे होलै जेकरामे ७०० भिक्षु सम्मिलित होलन आउ एहीसे ऊ सप्तशतिकाके नामसे विख्यात होलै ।
वर्गीकरण
मूल पालि साहित्य या पिटक
मूल पालि साहित्य तीन भागमे विभक्त है जेकरा पिटक कहल गेलै हे - "विनयपिटक", "सुत्तपिटक" आउ "अभिधम्मपिटक" । एकरामे से प्रत्येक पिटकके भीतरे अपन अपन विषयसे सम्बन्ध रखेवाला अनेक छोट बड़ रचनाके समावेश है ।
पालिके ई तीन पिटकमे ई पूर्व छठा शताब्दीमे होएल बुद्धके विचार आउ उपदेशके एगो विशेष शैलीमे सङ्कलन कैल गेलै हे । तीनो पिटकमे परस्पर तारतम्य है । विषयके मूलाधार सुत्तपिटक है जेकरामे बुद्धके उपदेशके श्रोताके हृदयङ्गम करावेला सरलसे सरल, रोचक कथात्मक शैलीके आलम्बन लेल गेलै हे । एहाँ वस्तुके संक्षेपमे कहेके प्रयत्न न कैल गेलै । उद्देश्य है नया-नया बातके सामान्य श्रोताके ग्रहण योग्य बनावेला आउ एहीसे एहाँ उपदेशके मुख्य भागके बेर-बेर पुनरावृत्ति कैल गेलै हे । प्रसङ्गवश ई सब सुत्तमे तत्कालीन धार्मिक, सामाजिक एवं राजनैतिक परिस्थितिके चित्रणो आ गेलै हे जे प्राचीन इतिहासके दृष्टिसे बड़ महत्वपूर्ण है । उदाहरणार्थ, दीघ निकायके समंञफल सुत्त, ब्रह्मजाल सुत्त एवं महापरिनिब्बान सुत्तमे बुद्धके समसामयिक धर्मप्रवर्तक जैसे मङ्खलिगोसाल, पकुधकच्चायन, अजित केस कम्बलि, सञ्जय बलट्ठिपुत्त निगण्ठनातपुत्त, आदिके आचार-विचार आउ उनका द्वारा प्रवर्तित धर्म सम्प्रदायके बौद्ध दृष्टिसे आलोचना पाएल जा है आउ साथे ऊ सब विषय पर बौद्ध मान्यताके प्रतिपादनो पाएल जा है । सामाजिक चित्रण सुत्तपिटकमे बिखरल है, तथापि खुद्दक निकायके अन्तर्गत जातकमे एकर प्रचुर सामग्री उपलब्ध है । सुत्त सबमे स्थान-स्थान पर बुद्धकालीन मगध, विदेह, कोशल, काशी आदि १६ जनपदके राजा, उनकर परस्पर सम्बन्ध एवं लड़ाई-झगड़ा आउ दाँव-पेँचके उल्लेख भरल पड़ल है । सुत्तके उपदेशमे जौन बौद्ध आचारके सङ्केत पाएल जा है, ओकरे भिक्षुके योग्य सदाचारके नियमके रूपमे विधि-निषेध-प्रणालीसे व्यवस्था विनय पिटकोमे कैल गेलै हे । एही प्रकार सुत्तमे जौन तत्वचिन्तनके बीज सन्निहित है, उनकर दार्शनिक शब्दावलीमे सैद्धान्तिक रूपसे प्रतिपादन आउ विवेचन अभिधम्मपिटकमे कैल गेलै हे । ई परस्पर आनुषङ्गिकताके चलते बौद्धधर्मके पूरा साङ्गोपाङ्ग एवं सुव्यवस्थित परिज्ञान बिन त्रिपिटकके अवलोकनके न हो सकै । ई पालि त्रिपिटक विषयके दृष्टिसे स्वयं बुद्धके उपदेश पर आधारित है । उपलब्ध ग्रन्थ रचनाके दृष्टि से ई. पूर्व तृतीय शताब्दीसे पश्चात् के सिद्ध न होवै । बौद्ध परम्परानुसार अशोक सम्राटके कालेमे उनकर पुत्र महेन्द्र स्वयं बौद्ध भिक्षु बनके ई साहित्यके सिंहल देश ले गेलन आउ ऊ ठामा प्रथम शती ई मे राजा बट्टगामणीके राज्यकालमे ओकरा ऊ लिखित रूप प्राप्त होलै जेकरामे ऊ आज हमनीके भेट है । तथापि ओकरामे ऐसन कोनो बात हमनीके न भेटै जे बीचके दु तीन शताब्दीके कालमे लङ्काके परिस्थितिके प्रभावके कारण ओकरामे आएल कहुँ जा सके ।
विनयपिटक
अपन नामानुसार विनयपिटकके विषय भिक्षुके पाले योग्य सदाचारके नियम उपस्थित कैल है । एकर तीन अवान्तर विभाग है - सुत्तविभङ्ग, खन्धक आउ परिवार । खन्धकके पुनः दु उपविभाग है - महावग्ग आउ चुल्लवग्ग । ई प्रकार अपन ई उपविभागके अपेक्षा विनयपिटक पाँच भागमे विभक्त है ।
सुत्तपिटक
सुत्तपिटक अपन विषय, विस्तार आउ रचनाके दृष्टिसे त्रिपिटकके सबसे महत्वपूर्ण भाग है । एकरामे ऐसन सुत्तके सङ्ग्रह कैल गेलै हे जे परम्परानुसार या त स्वयं बुद्धके कहल है या उनकर साक्षात् शिष्य द्वारा उपदिष्ट है आउ जेकर अनुमोदन स्वयं बुद्ध कैलन हे । सुत्तके संस्कृत रूपान्तर सूत्र कैल जा है । किन्तु प्रस्तुत सुत्तमे सूत्रके ऊ लक्षण दृष्टिगोचर न होवै जे संस्कृतके प्राचीन सूत्ररचना, जैसे वैदिक साहित्यके श्रौत सूत्र, गृह्म एवं धर्मसूत्र आदिमे पाएल जा है । सूत्रके विशेष लक्षण है अति संक्षेपमे कमसे कम शब्दमे अधिकसे अधिक अर्थ व्यक्त कैल । ओकरामे पुनरुक्तिके सर्वथा अभाव अविद्यमान है । किन्तु एहाँ संक्षिप्त शैलीके विपरीत सुविस्तृत व्याख्यान आउ मुख्य बातके बेर-बेर पुनरावृत्तिके शैली अपनावल गेलै हे । ई कारण सुत्तके सूत्र रूपान्तर उचित प्रतीत न होवै । विचार करेसे अनुमान होव है कि सुत्त के अभिप्राय मूलतः सूक्त से रहलै हे । वेदके एक एक प्रकरणोके सूक्ते कहल गेलै हे । कोनो एक बातके प्रतिपादनके सूक्त कहल सर्वथा उचित प्रतीत होव है ।
सुत्तपिटकके पाँच भाग है जेकरा निकाय कहल गेलै हे - दीघनिकाय, मज्झिमनिकाय, संयुक्तनिकाय, अङ्गुत्तरनिकाय आउ खुद्दकनिकाय ।
दीर्घनिकाय तीन वर्गमे विभाजित है । प्रथम सीलक्खन्धवग्ग मे १३ सुत्त है, दुसरका महावग्ग मे १० आउ तीसरा पाटिकवग्ग मे ११ । ई प्रकार दीर्घनिकायमे ३४ सुत्त है । ई सुत्त अन्य निकायमे सङ्गृहीत सुत्तके अपेक्षा विस्तारमे अधिक लम्बा है आउ एही ई निकायके नामके सार्थकता है ।
मज्झिमनिकाय मे मध्यमविस्तारके १५२ सुत्त है जे १५ वर्गमे विभक्त है -
- (१) मूलपरियाय (२) सीहनाद (३) ओपम्म (४) महायमक (5) चूलयमक
- (६) गहपति (७) भिक्खू (८) परिव्वाजक (९) राज (१०) ब्राह्मण
- (११) देवदह (१२) अनुपद (१३) सुंञता (१४) विभङ्ग आउ (१५) षडायत न ।
एकरामे से १४मा वर्ग विभङ्गमे १२ सुत्त है आउ शेष सबमे दस-दस ।
संयुत्तनिकाय मे छोट बड़ सब प्रकारके सुत्तके सङ्ग्रह है आउ एही ई निकायके नामके सार्थकता है । एकरामे कुल ५६ सुत्त या संयुत्त है जे ई पाँच वर्गमे विभाजित है -
- (१) सगाथ (२) निदान (३) खन्ध (४) षडायतन आउ (५) महावग्ग ।
अङ्गुत्तर निकाय के अपन एक विशेषता है । एकरामे सुत्तके सङ्ग्रह एक व्यवस्थाके अनुसार कैल गेलै हे । आदिमे ऐसन सुत्त है जेकरामे बुद्धके एक सङ्ख्यात्मक पदार्थ विषयक उपदेशके सङ्ग्रह है । तत्पश्चात् दु पदार्थ विषयक सुत्तके आउ फिर तीन, चार आदि । एही क्रमसे ई निकायके भीतरे एककनिपात, दुकनिपात एवं तिक, चतुवक, पञ्चक, छक्क, सत्तक, अट्ठक, नवक, दसक आउ एकादसक ई नामके इगारह निपातके सङ्कलन है । ई निपात पुनः वर्गमे विभाजित है जेकर सङ्ख्या निपात क्रमसे २१, १६, १६, २६, १२, ९, ९, ९, २२ आउ ३ है । ई प्रकार ११ निपातमे कुल वर्गके सङ्ख्या १६९ है । प्रत्येक वर्गके भीतरे अनेक सुत्त है जेकर सङ्ख्या एक वर्गमे कमसे कम ७ आउ अधिकसे अधिक २६२ है । ई प्रकार अङ्गुत्तर निकायसे सुत्तके सङ्ख्या २३०८ है ।
खुद्दक निकाय मे विषय आउ रचनाके दृष्टिसे प्रायः सर्वथा स्वतन्त्र १५ रचनाके समावेश है जेकर नाम है -
- (१) खुद्दक पाठ (२) धम्मपद (३) उदान (४) इतिवुत्तक (५) सुत्तनिपात
- (६) विमानवत्थु (७) पेतवत्थु (८) थेरगाथा (९) थेरीगाथा (१०) जातक
- (११) निद्देस (१२) पटिसम्भिदामग्ग (१३) अपादान (१४) बुद्धवंस आउ (१५) चरियापिटक ।
अभिधम्मपिटक
पालि त्रिपिटकके तीसरा भाग अभिधम्मपिटकमे बुद्धके दर्शनात्मक विचारके विश्लेषण आउ वर्गीकरण कैल गेलै हे आउ तात्विक दृष्टिसे एकर सूची आउ परिभाषा उपस्थित कैल गेलै हे । ई पिटकमे निम्न सात ग्रन्थके समावेश है -
- (१) धम्म्सङ्गणि (२) विभङ्ग (३) कथावत्थु (४) पुग्गलपञ्ञत्ति (५) धातुकथा (६) यमक आउ (७) पठ्ठान ।
धम्मसङ्गणि ओकर मातिका (विषयसूची) के अनुसार दु भागमे विभक्त है । प्रथम भागमे २२ तिक है जेकरामे से प्रत्येकमे तीन तीन विषयके विवेचन कैल गेलै हे । दुसरका विभागमे १०० दुक है आउ प्रत्येक दुकमे विधान आउ निषेध रूपसे दु दु विषयके प्ररूपण कैल गेलै हे । ई दुक १२ वर्गमे विभाजित है जेकर नाम है -
- (१) हेतु (२) प्रत्ययादि (३) आश्रव (४) संयोजन (५) ग्रन्थ (६) ओध
- (७) योग (८) नीवरण (९) परामर्श (१०) विस्तृत मध्यम दुक (११) उपादान आउ (१२) क्लेश ।
ई प्रकार धम्मसङ्गणिके तिक आउ दुक के सङ्ख्या १२२ है । एकरामे से प्रथम तिक कुशल, अकुशल आउ अव्याकृत धर्मविषयक है जे सबसे महत्वपूर्ण है आउ ओकर विषयके प्ररूपण (१) चित्तुपपाद (२) रूप (३) निक्क्षेप आउ (४) अत्थुद्धार ई चार काण्डमे कैल गेलै हे ।
विभङ्गके विषयवस्तु १७ विभागमे विभाजित है ।
कथावत्थुमे २३ अध्यायके भीतरे २१६ प्रश्नोत्तर है जेकरामे विरोधी सम्प्रदायके सिद्धान्तके खण्डन कैल गेलै हे ।
पुग्गलपण्णत्ति मे १० अध्याय है जेकरामे क्रमशः एक एक प्रकारके, दु दु प्रकारके आदि बढ़ित क्रममे दसमा अध्यायमे १० १० प्रकारके पुद्गल अर्थात् व्यक्तिके निर्देश कैल गेलै हे । व्यक्तिके विभाजन पृथग्जन, सम्यक् सम्बुद्ध, प्रत्येक बुद्ध, शैक्ष्य, अशैक्ष्य, आर्य, अनार्य आदि रूपसे कैल गेलै हे ।
पालिके शास्त्रीय ग्रन्थ
पालिमे समय-समय पर शास्त्रीय ग्रन्थो रचल गेलै हे । व्याकरणके क्षेत्रमे कच्चान आउ मोग्गल्लान कृत, व्याकरण आउ ओकर टीका प्रसिद्ध है । बरस ११५४ ई मे ब्रह्मदेशके भिक्षु अग्गवंस कृत सद्दनीति, कच्चानके व्याकरण पर आधारित पालिभाषाके व्याकरण है । एकर तीन भाग है - पदमाला, धातुमाला आउ सुत्तमाला । एकरे पर आधारित जिनरत्न भिक्षु कृत धात्वर्थदीपनी नामक पद्यबद्ध धातुसूची है । पालि व्याकरण विषयक अन्य कुछ रचना है - सद्धम्मगुरु कृत सद्दबुत्ति, मङ्गलकृत गन्धट्ठी आउ सामनेर धम्मदस्सी कृत वच्चवाचक (१४मा शती), अरियवंश कृत गन्धाभरण (१५मा शती), ब्रह्मदेशके नरश क्यच्चाके पुत्री कृत विभक्त्यर्थप्रकरण (१५मा शती), जम्बूध्वज कृत संवण्णणानय-दीपना आउ निरुत्तिसङ्गह (१७मा शती), राजगुरु कृत कारकपुप्फमञ्जरी (१८मा शती) ।
पालिके "अभिधानप्पदीपिका" आउ "एकक्खर कोश" ई सब कोश ग्रन्थ सुप्रसिद्ध है ।
पालि छन्दशास्त्रो पर अनेक रचना है, जैसे वृत्तोदय, छन्दोविचिति आउ कविभारप्रकरण आदि । एकरामे थर सङ्घरविखत कृत (१२मा शती) वृत्तोदये सबसे अधिक प्रसिद्ध है । एकरा पर वचनत्वजोतिका नामक टीको लिखल गेलै । एही सङ्घरविखत कृत पालि काव्यशास्त्रो पर एकमात्र रचना है - सुबोधालङ्कार ।
एकरो देखथिन
बाहरी कड़ी
- पालि साहित्यके इतिहास (गूगल पुस्तक ; लेखक - राहुल सांकृत्यायन)
- पालि भाषाः व्युत्पत्ति, भाषा-क्षेत्र एवं भाषिक प्रवृत्ति
Archived 2013-10-25 at the वेबैक मशीन (महावीर सरन जैनके आलेख)
शब्दकोश :
Archived 2012-10-08 at the वेबैक मशीन (PDF प्रारूपमे)
Archived 2008-04-04 at the वेबैक मशीन - A newly started project aimed at creating free online Pāli dictionaries and educational resources.
ग्रन्थ :
- पालि टेक्स्ट सोसायटी
- तिपिटक - Free searchable online database of Pali literature, including the whole Canon
- Complete Pāli Canon
Archived 2008-04-11 at the वेबैक मशीन in romanized Pali and Sinhala, mostly also in English translation
Archived 2007-03-11 at the वेबैक मशीन - एकरामे से कुछ पालि भाषामे है ।
पालि अध्ययन :
Archived 2007-09-29 at the वेबैक मशीन
Archived 2007-09-27 at the वेबैक मशीन (by Narada Thera)
Archived 2007-09-27 at the वेबैक मशीन (by G Duroiselle)
Archived 2006-02-11 at the वेबैक मशीन by Lily De Silva (UTF-8 encoded)
Archived 2008-05-13 at the वेबैक मशीन
- Free/Public-Domain Pāli Grammar (in PDF file)
- A Course in the Pali Language audio lectures by Bhikkhu Bodhi based on Gair & Karunatilleke (1998)।
चर्चा समूह :
Archived 2007-09-27 at the वेबैक मशीन
Archived 2007-09-11 at the वेबैक मशीन
Archived 2007-09-27 at the वेबैक मशीन
पालि साफ्टवेयर एवं उपकरण :
- Pāli Text Reader (software)
- Resources for reading & writing Pāli in indigenous scripts: Burmese, Sri Lankan, & Cambodian
Archived 2007-09-27 at the वेबैक मशीन