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आधुनिक युगसे पहिले त्रिपिटकके प्रति ताड़पत्र पर संरक्षित कैल जा हलै । एकरामे से अधिकांश बच न पैलै काहेकि दक्षिण एशिया आउ दक्षिण-पूर्व एशियाके जलवायु आर्द्र (नमीसे युक्त) है।

पालि साहित्य मे मुख्यतः बौद्धधर्मके प्रवर्तक गौतम बुद्धके उपदेशके सङ्ग्रह है । किन्तु ई कहल कठिन है कि एकर कोनो भाग बुद्धके जीवनकालमे व्यवस्थित या लिखित रूप धारण करकै हल कि न ।

पालि साहित्य

यद्यपि त्रिपिटकेमे कुछ ऐसन उल्लेख मिल है जेकरासे बुद्धके जीवनकालेमे धर्मके कुछ प्रकरणके व्यवस्थित पाठ कैल जाएके पता चल है । उदाहरणार्थ उदानमे वर्णन है कि एक बेर सीण नामक भिक्षुसे स्वयं भगवान् पूछलन कि तु धर्मके कैसे समझले? एकर उत्तरमे ऊ भिक्षु १६ अष्टक वर्गके पूरा स्वरके साथे गाके सुना देलकै । एकर भगवान् प्रशंसो कैलन । विनयपिटक आदि ग्रन्थमे बहुश्रुत, धर्मधर, विनयधर, मातृकाधर आउ पञ्चनेकायिक, भाणक, सुत्तन्तिक नियन विशेषणके प्रयोग मिल है जेकरासे स्पष्ट है कि बुद्धके उपदेशके धारण, पारणके परम्परा उनकर जीवनकालेसे चल पड़लै हल । ई परम्पराके आधार पर बुद्धके उपदेशके सुव्यवस्थित साहित्यिक रूप देवेला तीन बेर सङ्गीतिके जाएके उल्लेख चुल्लवग्ग, दीपवंश, महावंश आदि ग्रन्थमे मिल है ।

प्रथम सङ्गीति बुद्धनिर्वाणके चार मास पश्चाते राजगृहमे होलै जेकरामे ५०० भिक्षु भाग लेलन, जेकरा करण ऊ पञ्चशतिका नामोसे प्रसिद्ध है । एकर अध्यक्षता महाकाश्यप कैलन आउ ऊ बुद्धके साक्षात् शिष्य भिक्षु उपालिसे विनय सम्बन्धी आउ स्थविर आनन्दसे सुत्त सम्बन्धी प्रश्न पूछ-पूछके अन्य भिक्षुके अनुमोदनसे उक्त विषयके सङ्ग्रह कैलन । एही प्रकारके दुसर सङ्गीति बुद्ध निर्वाणके १०० वर्ष पश्चात् वैशालीमे होलै जेकरामे ७०० भिक्षु सम्मिलित होलन आउ एहीसे ऊ सप्तशतिकाके नामसे विख्यात होलै ।

वर्गीकरण

मूल पालि साहित्य या पिटक

मूल पालि साहित्य तीन भागमे विभक्त है जेकरा पिटक कहल गेलै हे - "विनयपिटक", "सुत्तपिटक" आउ "अभिधम्मपिटक" । एकरामे से प्रत्येक पिटकके भीतरे अपन अपन विषयसे सम्बन्ध रखेवाला अनेक छोट बड़ रचनाके समावेश है ।

पालिके ई तीन पिटकमे ई पूर्व छठा शताब्दीमे होएल बुद्धके विचार आउ उपदेशके एगो विशेष शैलीमे सङ्कलन कैल गेलै हे । तीनो पिटकमे परस्पर तारतम्य है । विषयके मूलाधार सुत्तपिटक है जेकरामे बुद्धके उपदेशके श्रोताके हृदयङ्गम करावेला सरलसे सरल, रोचक कथात्मक शैलीके आलम्बन लेल गेलै हे । एहाँ वस्तुके संक्षेपमे कहेके प्रयत्न न कैल गेलै । उद्देश्य है नया-नया बातके सामान्य श्रोताके ग्रहण योग्य बनावेला आउ एहीसे एहाँ उपदेशके मुख्य भागके बेर-बेर पुनरावृत्ति कैल गेलै हे । प्रसङ्गवश ई सब सुत्तमे तत्कालीन धार्मिक, सामाजिक एवं राजनैतिक परिस्थितिके चित्रणो आ गेलै हे जे प्राचीन इतिहासके दृष्टिसे बड़ महत्वपूर्ण है । उदाहरणार्थ, दीघ निकायके समंञफल सुत्त, ब्रह्मजाल सुत्त एवं महापरिनिब्बान सुत्तमे बुद्धके समसामयिक धर्मप्रवर्तक जैसे मङ्खलिगोसाल, पकुधकच्चायन, अजित केस कम्बलि, सञ्जय बलट्ठिपुत्त निगण्ठनातपुत्त, आदिके आचार-विचार आउ उनका द्वारा प्रवर्तित धर्म सम्प्रदायके बौद्ध दृष्टिसे आलोचना पाएल जा है आउ साथे ऊ सब विषय पर बौद्ध मान्यताके प्रतिपादनो पाएल जा है । सामाजिक चित्रण सुत्तपिटकमे बिखरल है, तथापि खुद्दक निकायके अन्तर्गत जातकमे एकर प्रचुर सामग्री उपलब्ध है । सुत्त सबमे स्थान-स्थान पर बुद्धकालीन मगध, विदेह, कोशल, काशी आदि १६ जनपदके राजा, उनकर परस्पर सम्बन्ध एवं लड़ाई-झगड़ा आउ दाँव-पेँचके उल्लेख भरल पड़ल है । सुत्तके उपदेशमे जौन बौद्ध आचारके सङ्केत पाएल जा है, ओकरे भिक्षुके योग्य सदाचारके नियमके रूपमे विधि-निषेध-प्रणालीसे व्यवस्था विनय पिटकोमे कैल गेलै हे । एही प्रकार सुत्तमे जौन तत्वचिन्तनके बीज सन्निहित है, उनकर दार्शनिक शब्दावलीमे सैद्धान्तिक रूपसे प्रतिपादन आउ विवेचन अभिधम्मपिटकमे कैल गेलै हे । ई परस्पर आनुषङ्गिकताके चलते बौद्धधर्मके पूरा साङ्गोपाङ्ग एवं सुव्यवस्थित परिज्ञान बिन त्रिपिटकके अवलोकनके न हो सकै । ई पालि त्रिपिटक विषयके दृष्टिसे स्वयं बुद्धके उपदेश पर आधारित है । उपलब्ध ग्रन्थ रचनाके दृष्टि से ई. पूर्व तृतीय शताब्दीसे पश्चात् के सिद्ध न होवै । बौद्ध परम्परानुसार अशोक सम्राटके कालेमे उनकर पुत्र महेन्द्र स्वयं बौद्ध भिक्षु बनके ई साहित्यके सिंहल देश ले गेलन आउ ऊ ठामा प्रथम शती ई मे राजा बट्टगामणीके राज्यकालमे ओकरा ऊ लिखित रूप प्राप्त होलै जेकरामे ऊ आज हमनीके भेट है । तथापि ओकरामे ऐसन कोनो बात हमनीके न भेटै जे बीचके दु तीन शताब्दीके कालमे लङ्काके परिस्थितिके प्रभावके कारण ओकरामे आएल कहुँ जा सके ।

विनयपिटक

अपन नामानुसार विनयपिटकके विषय भिक्षुके पाले योग्य सदाचारके नियम उपस्थित कैल है । एकर तीन अवान्तर विभाग है - सुत्तविभङ्ग, खन्धक आउ परिवार । खन्धकके पुनः दु उपविभाग है - महावग्ग आउ चुल्लवग्ग । ई प्रकार अपन ई उपविभागके अपेक्षा विनयपिटक पाँच भागमे विभक्त है ।

सुत्तपिटक

सुत्तपिटक अपन विषय, विस्तार आउ रचनाके दृष्टिसे त्रिपिटकके सबसे महत्वपूर्ण भाग है । एकरामे ऐसन सुत्तके सङ्ग्रह कैल गेलै हे जे परम्परानुसार या त स्वयं बुद्धके कहल है या उनकर साक्षात् शिष्य द्वारा उपदिष्ट है आउ जेकर अनुमोदन स्वयं बुद्ध कैलन हे । सुत्तके संस्कृत रूपान्तर सूत्र कैल जा है । किन्तु प्रस्तुत सुत्तमे सूत्रके ऊ लक्षण दृष्टिगोचर न होवै जे संस्कृतके प्राचीन सूत्ररचना, जैसे वैदिक साहित्यके श्रौत सूत्र, गृह्म एवं धर्मसूत्र आदिमे पाएल जा है । सूत्रके विशेष लक्षण है अति संक्षेपमे कमसे कम शब्दमे अधिकसे अधिक अर्थ व्यक्त कैल । ओकरामे पुनरुक्तिके सर्वथा अभाव अविद्यमान है । किन्तु एहाँ संक्षिप्त शैलीके विपरीत सुविस्तृत व्याख्यान आउ मुख्य बातके बेर-बेर पुनरावृत्तिके शैली अपनावल गेलै हे । ई कारण सुत्तके सूत्र रूपान्तर उचित प्रतीत न होवै । विचार करेसे अनुमान होव है कि सुत्त के अभिप्राय मूलतः सूक्त से रहलै हे । वेदके एक एक प्रकरणोके सूक्ते कहल गेलै हे । कोनो एक बातके प्रतिपादनके सूक्त कहल सर्वथा उचित प्रतीत होव है ।

सुत्तपिटकके पाँच भाग है जेकरा निकाय कहल गेलै हे - दीघनिकाय, मज्झिमनिकाय, संयुक्तनिकाय, अङ्गुत्तरनिकाय आउ खुद्दकनिकाय

दीर्घनिकाय तीन वर्गमे विभाजित है । प्रथम सीलक्खन्धवग्ग मे १३ सुत्त है, दुसरका महावग्ग मे १० आउ तीसरा पाटिकवग्ग मे ११ । ई प्रकार दीर्घनिकायमे ३४ सुत्त है । ई सुत्त अन्य निकायमे सङ्गृहीत सुत्तके अपेक्षा विस्तारमे अधिक लम्बा है आउ एही ई निकायके नामके सार्थकता है ।

मज्झिमनिकाय मे मध्यमविस्तारके १५२ सुत्त है जे १५ वर्गमे विभक्त है -

(१) मूलपरियाय (२) सीहनाद (३) ओपम्म (४) महायमक (5) चूलयमक
(६) गहपति (७) भिक्खू (८) परिव्वाजक (९) राज (१०) ब्राह्मण
(११) देवदह (१२) अनुपद (१३) सुंञता (१४) विभङ्ग आउ (१५) षडायत न ।

एकरामे से १४मा वर्ग विभङ्गमे १२ सुत्त है आउ शेष सबमे दस-दस ।

संयुत्तनिकाय मे छोट बड़ सब प्रकारके सुत्तके सङ्ग्रह है आउ एही ई निकायके नामके सार्थकता है । एकरामे कुल ५६ सुत्त या संयुत्त है जे ई पाँच वर्गमे विभाजित है -

(१) सगाथ (२) निदान (३) खन्ध (४) षडायतन आउ (५) महावग्ग ।

अङ्गुत्तर निकाय के अपन एक विशेषता है । एकरामे सुत्तके सङ्ग्रह एक व्यवस्थाके अनुसार कैल गेलै हे । आदिमे ऐसन सुत्त है जेकरामे बुद्धके एक सङ्ख्यात्मक पदार्थ विषयक उपदेशके सङ्ग्रह है । तत्पश्चात् दु पदार्थ विषयक सुत्तके आउ फिर तीन, चार आदि । एही क्रमसे ई निकायके भीतरे एककनिपात, दुकनिपात एवं तिक, चतुवक, पञ्चक, छक्क, सत्तक, अट्ठक, नवक, दसक आउ एकादसक ई नामके इगारह निपातके सङ्कलन है । ई निपात पुनः वर्गमे विभाजित है जेकर सङ्ख्या निपात क्रमसे २१, १६, १६, २६, १२, ९, ९, ९, २२ आउ ३ है । ई प्रकार ११ निपातमे कुल वर्गके सङ्ख्या १६९ है । प्रत्येक वर्गके भीतरे अनेक सुत्त है जेकर सङ्ख्या एक वर्गमे कमसे कम ७ आउ अधिकसे अधिक २६२ है । ई प्रकार अङ्गुत्तर निकायसे सुत्तके सङ्ख्या २३०८ है ।

खुद्दक निकाय मे विषय आउ रचनाके दृष्टिसे प्रायः सर्वथा स्वतन्त्र १५ रचनाके समावेश है जेकर नाम है -

(१) खुद्दक पाठ (२) धम्मपद (३) उदान (४) इतिवुत्तक (५) सुत्तनिपात
(६) विमानवत्थु (७) पेतवत्थु (८) थेरगाथा (९) थेरीगाथा (१०) जातक
(११) निद्देस (१२) पटिसम्भिदामग्ग (१३) अपादान (१४) बुद्धवंस आउ (१५) चरियापिटक ।

अभिधम्मपिटक

पालि त्रिपिटकके तीसरा भाग अभिधम्मपिटकमे बुद्धके दर्शनात्मक विचारके विश्लेषण आउ वर्गीकरण कैल गेलै हे आउ तात्विक दृष्टिसे एकर सूची आउ परिभाषा उपस्थित कैल गेलै हे । ई पिटकमे निम्न सात ग्रन्थके समावेश है -

(१) धम्म्सङ्गणि (२) विभङ्ग (३) कथावत्थु (४) पुग्गलपञ्ञत्ति (५) धातुकथा (६) यमक आउ (७) पठ्ठान ।

धम्मसङ्गणि ओकर मातिका (विषयसूची) के अनुसार दु भागमे विभक्त है । प्रथम भागमे २२ तिक है जेकरामे से प्रत्येकमे तीन तीन विषयके विवेचन कैल गेलै हे । दुसरका विभागमे १०० दुक है आउ प्रत्येक दुकमे विधान आउ निषेध रूपसे दु दु विषयके प्ररूपण कैल गेलै हे । ई दुक १२ वर्गमे विभाजित है जेकर नाम है -

(१) हेतु (२) प्रत्ययादि (३) आश्रव (४) संयोजन (५) ग्रन्थ (६) ओध
(७) योग (८) नीवरण (९) परामर्श (१०) विस्तृत मध्यम दुक (११) उपादान आउ (१२) क्लेश ।

ई प्रकार धम्मसङ्गणिके तिक आउ दुक के सङ्ख्या १२२ है । एकरामे से प्रथम तिक कुशल, अकुशल आउ अव्याकृत धर्मविषयक है जे सबसे महत्वपूर्ण है आउ ओकर विषयके प्ररूपण (१) चित्तुपपाद (२) रूप (३) निक्क्षेप आउ (४) अत्थुद्धार ई चार काण्डमे कैल गेलै हे ।

विभङ्गके विषयवस्तु १७ विभागमे विभाजित है ।

कथावत्थुमे २३ अध्यायके भीतरे २१६ प्रश्नोत्तर है जेकरामे विरोधी सम्प्रदायके सिद्धान्तके खण्डन कैल गेलै हे ।

पुग्गलपण्णत्ति मे १० अध्याय है जेकरामे क्रमशः एक एक प्रकारके, दु दु प्रकारके आदि बढ़ित क्रममे दसमा अध्यायमे १० १० प्रकारके पुद्गल अर्थात् व्यक्तिके निर्देश कैल गेलै हे । व्यक्तिके विभाजन पृथग्जन, सम्यक् सम्बुद्ध, प्रत्येक बुद्ध, शैक्ष्य, अशैक्ष्य, आर्य, अनार्य आदि रूपसे कैल गेलै हे ।

पालिके शास्त्रीय ग्रन्थ

पालिमे समय-समय पर शास्त्रीय ग्रन्थो रचल गेलै हे । व्याकरणके क्षेत्रमे कच्चान आउ मोग्गल्लान कृत, व्याकरण आउ ओकर टीका प्रसिद्ध है । बरस ११५४ ई मे ब्रह्मदेशके भिक्षु अग्गवंस कृत सद्दनीति, कच्चानके व्याकरण पर आधारित पालिभाषाके व्याकरण है । एकर तीन भाग है - पदमाला, धातुमाला आउ सुत्तमाला । एकरे पर आधारित जिनरत्न भिक्षु कृत धात्वर्थदीपनी नामक पद्यबद्ध धातुसूची है । पालि व्याकरण विषयक अन्य कुछ रचना है - सद्धम्मगुरु कृत सद्दबुत्ति, मङ्गलकृत गन्धट्ठी आउ सामनेर धम्मदस्सी कृत वच्चवाचक (१४मा शती), अरियवंश कृत गन्धाभरण (१५मा शती), ब्रह्मदेशके नरश क्यच्चाके पुत्री कृत विभक्त्यर्थप्रकरण (१५मा शती), जम्बूध्वज कृत संवण्णणानय-दीपना आउ निरुत्तिसङ्गह (१७मा शती), राजगुरु कृत कारकपुप्फमञ्जरी (१८मा शती) ।

पालिके "अभिधानप्पदीपिका" आउ "एकक्खर कोश" ई सब कोश ग्रन्थ सुप्रसिद्ध है ।

पालि छन्दशास्त्रो पर अनेक रचना है, जैसे वृत्तोदय, छन्दोविचिति आउ कविभारप्रकरण आदि । एकरामे थर सङ्घरविखत कृत (१२मा शती) वृत्तोदये सबसे अधिक प्रसिद्ध है । एकरा पर वचनत्वजोतिका नामक टीको लिखल गेलै । एही सङ्घरविखत कृत पालि काव्यशास्त्रो पर एकमात्र रचना है - सुबोधालङ्कार ।

एकरो देखथिन

बाहरी कड़ी

Archived 2013-10-25 at the वेबैक मशीन (महावीर सरन जैनके आलेख)

शब्दकोश :

Archived 2012-10-08 at the वेबैक मशीन (PDF प्रारूपमे)

Archived 2008-04-04 at the वेबैक मशीन - A newly started project aimed at creating free online Pāli dictionaries and educational resources.

ग्रन्थ :

Archived 2008-04-11 at the वेबैक मशीन in romanized Pali and Sinhala, mostly also in English translation

Archived 2007-03-11 at the वेबैक मशीन - एकरामे से कुछ पालि भाषामे है ।

पालि अध्ययन :

Archived 2007-09-29 at the वेबैक मशीन

Archived 2007-09-27 at the वेबैक मशीन (by Narada Thera)

Archived 2007-09-27 at the वेबैक मशीन (by G Duroiselle)

Archived 2006-02-11 at the वेबैक मशीन by Lily De Silva (UTF-8 encoded)

Archived 2008-05-13 at the वेबैक मशीन

चर्चा समूह :

Archived 2007-09-27 at the वेबैक मशीन

Archived 2007-09-11 at the वेबैक मशीन

Archived 2007-09-27 at the वेबैक मशीन

पालि साफ्टवेयर एवं उपकरण :

Archived 2007-09-27 at the वेबैक मशीन