Wp/mag/पार्वती
| माता पार्वती (सती/गौरी) | |
|---|---|
| शक्ति, सुन्दरता, देवत्व, दिव्य शक्ति, ऊर्जा, सुहाग, सद्भाव, प्रजनन क्षमता, प्रेम, विवाह, सन्ततिके देवी एवं साक्षात् प्रकृति स्वरूपा, शिवानी (शिवके पटरानी), महादेवी, महाकाली, जगजन्नी, जगतमाता | |
माँ पार्वती अपन पुत्र गणेशके साथे | |
| अन्यनाम | आदि पराशक्ति, आदिशक्ति दुर्गा नारायणी, लक्ष्मी, ब्राह्मणी, सरस्वती देवी, सती, गायत्री, शिवानी, शाकम्भरी, चामुण्डा, काली, महाकाली, कामाख्या, त्रिपुर सुन्दरी, छिन्नमस्ता, भैरवी, महादेवी, महाविद्या, मातङ्गी, भगवती, भवानी, शताक्षी देवी, प्रत्यङ्गिरा, महिषासुर मर्दिनी, नवदुर्गा, देवी मैया, शाकम्भरी, शक्ति (देवी), गौरी, वैष्णवी, वैष्णो देवी, कल्याणी, शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री |
| सम्बन्ध | देवी, शक्ति, आदि शक्ति, आदि पराशक्ति, |
| निवासस्थान | कैलाश (ससुराल), हिमालय (पैतृक घर), मनिद्विप |
| मन्त्र | ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ ॥ ॐ उमामहेश्वराभ्याम् नमः॥
॥ ॐ कात्यायन्यै च विद्महे कन्याकुमार्यै च धीमहि तन्नो दुर्गे प्रचोदयात् ॥ ॥ ॐ सर्वसम्मोहन्यै च विद्महे विश्वजनन्यै च धीमहि तन्नो शक्ति प्रचोदयात् ॥ ॥ ॐ नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै शततं नमः ॥ ॥ ॐ नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियतां प्रणतास्मिताम् ॥ |
| अस्त्र | त्रिशूल, पाश, गदा, वज्र , आगके कटोरी , शङ्ख, चक्र भाला, डमरू , खप्पर , कमल , परशु , रस्सी, धनुष बाण, कुन्त, मूसल, खड्ग, तलवार, परशु, यम दण्ड एवं विश्वके समस्त दिव्यास्त्र |
| युद्ध | महिषासुर एवं देवीके महिषासुरमर्दिनी रूपके युद्ध
चण्ड मुण्ड एवं देवीके काली रूपके युद्ध धूम्रलोचन एवं देवीके चण्डी रूपके युद्ध दुर्गामासुर एवं देवके दुर्गा रूपके युद्ध शुम्भ निशुम्भ एवं देवीके कौशीकी रूपके युद्ध |
| दिवस | सोमवार आउ शुक्रवार |
| जीवनसङ्गी | शिव |
| माता-पिता |
|
| भाई-बहिन | विष्णु बड़ भाई (भाई बनके शिवजीके साथे विवाह करा देलन हल)
माता गङ्गा छोट बहिन अदिति पूर्व जन्ममे माता सतीके बड़ बहिन दिति पूर्व जन्ममे माता सतीके बड़ बहिन कद्रु पूर्व जन्ममे माता सतीके बड़ बहिन विनीता पूर्व जन्ममे माता सतीके बड़ बहिन |
| सन्तान | कार्तिकेय, अशोकसुन्दरी , अय्यप्पा , देवी ज्योति , मनसा देवी आउ गणेश |
| सवारी | शेर, बाघ |
| शास्त्र | वेद, श्री देवी भागवत पुराण, काली पुराण, तन्त्र चुरामणि, देवी महातम्यम, रामायण, श्री दुर्गा सप्तशती, श्री चण्डी पाठ, शिव महापुराण, विष्णु पुराण, गणेश पुराण, स्कन्द पुराण, उपनिषद, श्री पार्वती महात्मय , श्री माता पार्वती चालीसा, श्री ५२ शक्ति पीठ महात्म्य एवं अन्य ढेर धार्मिक ग्रन्थ आउ किंवदन्ती |
| त्योहार | गङ्गौर, महाशिवरात्रि, दुर्गाष्टमी, नवरात्रि, दुर्गा पूजा, हरितालिका तीज, श्रावण, गौरी पूजन, तीज, काली पूजा, गौरी तृतीय, शीतलाष्टमी |
पार्वती, उमा वा गौरी मातृत्व, शक्ति, प्रेम, सौन्दर्य, सद्भाव, विवाह, सन्तानके देवी हथिन । इनकर मूल नाम उमा है किन्तु हिमालय पर्वतके पुत्री होवेके कारण इनका पार्वती कहल जा है ।[1][2][3] देवी पार्वती ढेर अन्य नामसे जानल जा हथिन, ऊ सर्वोच्च हिन्दु देवी परमेश्वरी आदि पराशक्ति (शिवशक्ति) के साकार रूप हथिन आउ शाक्त सम्प्रदाय या हिन्दुधर्ममे एक उच्चकोटि या प्रमुख देवी हथिन आउ उनकर ढेर गुण, रूप आउ पहलू है । उनकर प्रत्येक पहलुके एक अलग नामके साथे व्यक्त कैल जा है, जेकरासे उनकर भारतके क्षेत्रीय हिन्दु कहानीमे १०००० से अधिक नाम मिललै हे । लक्ष्मी आउ सरस्वतीके साथे, ऊ हिन्दु देवी-देवता (त्रिदेवी) के त्रिमूर्तिके निर्माण करऽ हथिन ।[4] माता पार्वती हिन्दु भगवान् शिवके पत्नी हथिन । ऊ पर्वत राजा हिमाञ्चल आउ रानी मैनाके पुत्री हथिन । पार्वतीके जन्मस्थान उत्तराखण्डके चमोली जिलामे मानल जा है जन्ने उनका नन्दाके रूपमे पूजल जा है आउ एही कारण ओहाँ हर १२ सालमे नन्दा राजजातके आयोजन कैल जा है ।[5] पार्वती हिन्दु देवता गणेश, अशोकसुन्दरी, ज्योति आउ मनसाके माँ आउ कार्तिकेय, अय्यप्पाके सौतेली माता हथिन । उनका श्री विष्णु भगवानके बहिन कहल गेलै हे। ओही मूल प्रकृति आउ कारणरूपा हथिन ।[6][7] शिव विश्वके चेतना हथिन त पार्वती विश्वके ऊर्जा हथिन । पार्वती माता जगतजननी अथवा परब्रह्मस्वरूपिणी हथिन ।
नामवाली
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ललिता सहस्रनाममे पार्वती (ललिताके रूपमे) के १,००० नामके सूची है । [8] पार्वतीके सबसे प्रसिद्ध दु मे से एक उमा आउ अपर्णा है ।[9] स्कन्द पुराणके अनुसार देवी पार्वतीके द्वारा दुर्गमसुरके मारेके बाद देवी पार्वतीके नाम दुर्गा पड़लै । उमा नामके उपयोग सतीला (शिवके पहिल पत्नी, जिनकर पार्वतीके रूपमे पुनर्जन्म होलै हे) कैल जा है, रामायणमे देवी पार्वतीके उमा नामोसे सम्बोधित कैल गेलै हे, देवी पार्वतीके अपर्णाके रूपमे सन्दर्भित कैल जा है ('जे सबके भरण पोषण करऽ हथिन') । देवी पार्वती अम्बिका ('प्रिय माँ'), शक्ति ('शक्ति'), माताजी ('पूज्य माता'), माहेश्वरी ('महान देवी'), दुर्गा (अजेय), भैरवी ('क्रूर'), भवानी ('उर्वरता') आदि नामसे जानल जा हथिन । पार्वती प्रेम आउ भक्तिके देवी हथिन, या कामाक्षी; प्रजनन, बहुतायत आउ भोजन / पोषणके देवी अन्नपूर्णा कहल गेलै हे । [10]देवी पार्वती एक क्रूर महाकालियो हथिन जे तलवार उठावऽ हथिन, गम्भीर सिरके माला पेहेनऽ हथिन, आउ अपन भक्तके रक्षा करऽ हथिन आउ दुनिया आउ प्राणीके दुर्दशा करे वाला सब बुराईके नष्ट करऽ हथिन । देवी पार्वतीके स्वर्ण, गौरी, काली या श्यामाके रूपमे सम्बोधित कैल जा है, इनकर एक शान्त रूप गौरी है, त दोसर भयङ्कर रूप काली है ।
इतिहासमे पार्वती
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पर्वती शब्द वैदिक साहित्यमे प्रयोग न कैल जा हलै । एकर बजाय अम्बिका, रुद्राणीके प्रयोग कैल गेलै हे ।[11] उपनिषद काल (वेदान्त काल) के दोसर प्रमुख उपनिषद केनोपनिषदमे देवी पार्वतीके उल्लेख मिलऽ है, ओहाँ उनका हेमवती उमा नामसे जानल जा है [11]आउ ओहाँ पर उनका ब्रह्मविद्यो जानेला मिलऽ है आउ इनका दुनियाके माँ नियन देखावल गेलै हे ।[12] एहाँ देवी पार्वतीके सर्वोच्च परब्रह्मके शक्ति, या आवश्यक शक्तिके रूपमे प्रकट कैल गेलै हे । उनका प्राथमिक भूमिका एक मध्यस्थके रूपमे है, जे अग्नि, वायु आउ वरुणके ब्रह्म ज्ञान दे हथिन, जे राक्षसके एक समूहके हालिया हारके बारेमे घमण्ड कर रहलै हल ।[13] देवीके सती-पार्वती नाम महाकाव्य काल (४०० ईसा पूर्व -४०० ईस्वी) मे प्रकट होवऽ है, जन्ने ऊ शिवके पत्नी हथिन ।[11] वेबरके सुझाव है कि जैसे शिव विभिन्न वैदिक देवता रुद्र आउ अग्निके संयोजन हथिन, ओइसहीँ पुराण पाठमे पार्वती रुद्रके पत्निके एक संयोजन हथिन । दोसर शब्दमे पार्वतीके प्रतीकात्मकता आउ विशेषता समयके साथे उमा, हेमावती, अम्बिका, गौरीके एक पहलूमे आउ अधिक क्रूर, विनाशकारी काली, नीरतिके रूपमे विकसित होलै ।[12][14][15]
शारीरिक रूप आउ प्रतीक
[edit | edit source]देवी पार्वतीके आमतौर पर निष्पक्ष, सुन्दर आउ परोपकारीके रूपमे दर्शावल जा है ।[16][17] ऊ आमतौर पर एक लाल पोशाक (अक्सर एक साड़ी) पेहेनऽ हथिन आउ क्रोध अवस्थामे कालीके रूपोमे दर्शावल गेलै हे । जखनी शिवके साथे चित्रित कैल जा है, त ऊ आमतौर पर दु भुजाके साथे लौकऽ हथिन, किन्तु जखनी ऊ अकेली होवे त उनका चार हाथमे चित्रित कैल जा सकऽ है । ई सब हाथमे त्रिशूल, दर्पण, माला, फूल (जैसे कमल) हो सकऽ है । प्राचीन मन्दिरमे, पार्वतीके मूर्ति अक्सर एक बछड़ा या गायके पास चित्रित होवऽ है - भोजनके एक स्रोत । उनकर मूर्तिला कांस्य मुख्य धातु रहलै हे, जखनीकि पत्थर आम सामग्री रहलै हे ।[3]
देवी पार्वतीके अन्य रूप
[edit | edit source]ढेर हिन्दु कहानी पार्वतीके वैकल्पिक पहलूके प्रस्तुत करऽ है, जैसे कि क्रूर, हिंसक पहलू । उनकर रूप एक क्रोधित, रक्त-पियासल, उलझल केश वाली देवी, खुलल मुँह वाली आउ एक टेढ़ जीभके साथे कैल गेलै हे । ई देवीके पहचान आमतौर पर भयानक महाकाली (समय) के रूपमे कैल जा है । लिङ्गपुराणके अनुसार पार्वती शिवके अनुरोध पर एक असुर (दानव) दारुकके नष्ट करेला अपन नेत्रसे कालीके प्रकट कैलन । दानवके नष्ट करेके बादो कालीके प्रकोपके नियन्त्रित न कैल जा सकलै । कालीके क्रोधके कम करेला शिव उनकर गोड़के नीचे जाके सुत गेलन, जखनी कालीके गोड़ शिवके छाती पर पड़लै त कालीके जीभ शर्मसे बाहिरे निकल ऐलै, आउ काली शान्त हो गेलन ।[18] स्कन्द पुराण मे पार्वती एक योद्धा-देवीके रूप धारण करऽ हथिन आउ दुर्ग नामक एक राक्षसके हरा दे हथिन जे भैँसके रूप धारण करऽहै । ई पहलूमे उनका दुर्गाके नामसे जानल जा है ।[19]
देवी भागवत पुराणके अनुसार पार्वती अन्य सब देवीके वंशावली हथिन । इनका ढेर रूप आउ नाम साथे पूजल जा है । देवी पार्वतीके रूप या अवतार उनकर भाव पर निर्भर करऽ है । उदाहरणला:
दुर्गा पार्वतीके एक भयानक रूप हथिन, आउ कुछ ग्रन्थमे लिखल है कि पार्वती राक्षस दुर्गमासुरके वध कैलन हल आउ एही कारण ऊ दुर्गाके नामसे प्रसिद्ध होइलन हल । नवदुर्गा नामक नौ रूपमे दुर्गाके पूजा कैल जा है । नौ पहलुमे से प्रत्येकमे पार्वतीके जीवनके एक बिन्दुके दर्शावल गेलै हे । ऊ दुर्गाके रूपोमे राक्षस महिषासुर, शुम्भ आउ निशुम्भके वधोला पूजल जा हथिन । ऊ बङ्गाली राज्यमे अष्टभुजा दुर्गा, आउ तेलुगु राज्यमे कनकदुर्गाके रूपमे पूजल जा हथिन ।
महाकाली पार्वतीके सबसे क्रूर रूप हथिन, ई समय आउ परिवर्तनके देवीके रूपमे साहस आउ अन्तिम सांसारिक प्रलयके प्रतिनिधित्व करऽ हथिन । काली दस महाविद्यामे से एक देवी हथिन, जे नवदुर्गा नियन हथिन जे पार्वतीके अवतार हथिन । कालीके दक्षिणमे भद्रकाली आउ उत्तरमे दक्षिणा कालीके रूपमे पूजल जा है । पूरा भारतमे उनका महाकालीके रूपमे पूजल जा है । ऊ त्रिदेवीमे से एक देवी हथिन आउ त्रिदेवीके स्रोतो हथिन । ऊ परब्रह्मके पूर्ण शक्ति हथिन, काहेकि ऊ सब प्राण ऊर्जाके माता हथिन । ऊ आदिशक्तिके सक्रिय रूप हथिन । ऊ तामस गुणके प्रतिनिधित्व करऽ हथिन, आउ ऊ तीनो गुणसे परे हथिन, महाकाली शून्य अन्धकारके भौतिक रूप है जेकरामे ब्रह्माण्ड मौजूद है, आउ अन्तमे महाकाली सबकुछ अपने भीतरे घोर ले हथिन । ऊ त्रिशक्तिके "क्रिया शक्ति" हथिन, आउ अन्य शक्तिके स्रोत हथिन । ऊ कुण्डलिनी शक्ति हथिन जे हर मौजूदा जीवन रूपके मूलमे गहराईसे समाएल रहऽ हथिन ।
पूर्वजन्मके कथा
[edit | edit source]पार्वती पूर्वजन्ममे दक्ष प्रजापतिके पुत्री सती हलन आउ ऊ जन्मोमे ऊ भगवान् शङ्करेके पत्नी हलन । सती अपन पिता दक्ष प्रजापतिके यज्ञमे अपन पतिके अपमान न सह पावेके कारण स्वयंके योगाग्निमे भस्म कर देलन हल । भगवान् शङ्करके जखनी ई बात पता चललै त ऊ वीरभद्रके रूपमे दक्ष प्रजापतिके यज्ञके नष्ट कर देलन । भगवान् शिव सतीके शवके लेके ताण्डव करे लगलन । ओही समय भगवान् विष्णु अपन सुदर्शन चक्रसे माता सतीके शवके एकावन भाग कर देलन । जन्ने जन्ने माता सतीके ई अङ्ग गिरलै ओहाँ शक्तिपीठके स्थापना होलै । अगला जन्ममे माता सती पार्वती बनके हिमनरेश हिमवानके घर अवतरित होलन ।
पार्वतीके तपस्या
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पार्वती भगवान् शिवके पतिके रूपमे प्राप्त करेला वनमे तपस्या करे चल गेलन । अनेक वर्ष तक कठोर उपवास करके घोर तपस्या कैलन तत्पश्चात् वैरागी भगवान् शिव उनकासे विवाह करेला स्वीकार कैलन ।
पार्वतीके परीक्षा
[edit | edit source]भगवान् शङ्कर पार्वतीके अपन प्रति अनुरागके परीक्षा लेवेला सप्तऋषिके पार्वतीके पास भेजलन । ऊ पार्वतीके पास जाके उनका ई समझावेके अनेक प्रयत्न कैलन कि शिवजी औघड़, अमङ्गल वेषधारी आउ जटाधारी हथिन आउ ऊ उनकाला उपयुक्त वर न हथिन । उनका साथ विवाह करके उनका सुखके प्राप्ति न होतै । अपने उनकर ध्यान छोड़ देथिन । किन्तु पार्वती अपन विचारमे दृढ़ रहलन । उनकर दृढ़ताके देखके सप्तऋषि अत्यन्त प्रसन्न होइलन आउ उनका सफल मनोरथ होवेके आशीर्वाद देके शिवजीके पास वापिस आ गेलन । सप्तऋषिसे पार्वतीके अपन प्रति दृढ़ प्रेमके वृत्तान्त सुनके भगवान् शङ्कर अत्यन्त प्रसन्न होलन ।
सप्तऋषि सब शिवजी आउ पार्वतीके विवाहके लग्न मुहूर्त आदि निश्चित कर देलन ।
शिवजीके साथे विवाह
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निश्चित दिन शिवजी बरात लेके हिमालयके घर ऐलन । ऊ बैल पर सवार हलन । उनकर एक हाथमे त्रिशूल आउ एक हाथमे डमरू हलै । उनकर बरातीमे समस्त देवताके साथे उनकर गण भूत, प्रेत, पिशाच आदियो हलन । सब बराती नाचैत गावैत हलन । सब संसारके प्रसन्न करे वाला भगवान् शिवके बरात अत्यन्त मनमोहक हलै, ब्रह्माजीके उपस्थितिमे विवाह समारोह शुरू हो गेलै ।[20] शिव आउ पार्वतीके विवाह उत्तराखण्डके त्रियुगीनारायणमे होलै जन्ने नारायण पार्वतीके भाई बनके सब रीति रिवाज निभैलन आउ ब्रह्मा ई विवाहके पुरोहित बनलन । आझो त्रियुगीनारायण मन्दिरमे ऊ अखण्ड अग्निकुण्ड लगातार प्रज्वलित है । ई प्रकार शुभ घड़ी आउ शुभ मुहूर्तमे शिवजी आउ पार्वतीके विवाह हो गेलै आउ पार्वतीके साथ लेके शिवजी अपन धाम कैलाश पर्वत पर सुख पूर्वक रहे लगलन ।
देवी पार्वतीके समर्पित त्यौहार
[edit | edit source]हरतालिका तीज
[edit | edit source]हरतालिका तीजके हरतालिका व्रत या तीजौ कहल जा है । ई व्रत भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षके तृतीयाके हस्त नक्षत्रके दिन होवऽ है । ई दिन कुमारी आउ सौभाग्यवती स्त्री गौरी-शङ्करके पूजा करऽ हथिन । विशेषकरके उत्तरप्रदेशके पूर्वाञ्चल आउ बिहारमे मनावल जाएवाला ई त्योहार करवाचौथोसे कठिन मानल जा है काहेकि जन्ने करवाचौथमे चान्द देखेके बाद व्रत तोड़ देल जा है ओहैँ ई व्रतमे पूरा दिन निर्जल व्रत कैल जा है आउ अगला दिन पूजनके पश्चाते व्रत तोड़ल जा है ।
सौभाग्यवती स्त्रि अपन सुहागके अखण्ड बनैले रखे आउ अविवाहित युवती सब मन मुताबिक वर पावेला हरितालिका तीजके व्रत कर हथिन । ई दिन विशेष रूपसे गौरी−शङ्करेके पूजन कैल जा है । ई दिन व्रत करे वाली स्त्री सूर्योदयसे पहिलहीँ उठ जा हथिन आउ नहाधोके पूरा शृङ्गार करऽ हथिन । पूजनला केलाके पत्तासे मण्डप बनाके गौरी−शङ्करके प्रतिमा स्थापित कैल जा है । एकर साथे पार्वतीजीके सुहागके सब सामान चढ़ावल जा है । रातमे भजन, कीर्तन करैत जागरणके तीन बार आरती कैल जा है आउ शिव पार्वती विवाहके कथा सुनल जा है ।
नवरात्रि
[edit | edit source]पार्वतीके श्रद्धामे एक आउ लोकप्रिय त्योहार नवरात्रि है, जेकरामे नौ दिन तक उनकर सब रूपके पूजा कैल जा है । पूर्वी भारतमे विशेष रूपसे बङ्गाल, ओडिशा, झारखण्ड आउ असमके साथे-साथे भारतके ढेर अन्य भाग जैसे कि गुजरातमे उनकर नौ रूप मने शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कुष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्रीके पूजा कैल जा है ।[21] आउओ ढेर स्थानीय त्यौहार है जे देवी पार्वतीके समर्पित है ।
प्रमुख मन्दिर
[edit | edit source]पार्वती अक्सर शिवके साथे पूरा दक्षिण एशिया आउ दक्षिणपूर्व एशियाके शिव मन्दिरमे मौजूद रहऽ हथिन । कुछ स्थान जैसे शक्तिपीठके उनकर ऐतिहासिक महत्व आउ हिन्दुधर्मके प्राचीन ग्रन्थमे उनकर उत्पत्तिके बारेमे बतावल गेलै हे आउ विशेष मानल गेलै हे ।[22]

५१ शक्तिपीठके नाम
[edit | edit source]देवी पार्वती भारतीय उपमहाद्वीपके बाहरे
[edit | edit source]देवी पार्वतीके प्रतिमा या मूर्तिकला, दक्षिणपूर्व एशियाके मन्दिर आउ साहित्यमे पाएल गेलै हे । उदाहरणला कम्बोडियामे खमेरके प्रारम्भिक शैव शिलालेख, जे पचमा शताब्दी ईस्वीके आसपासके समयके है, ओकरामे पार्वती (उमा) आउ शिवके उल्लेख है ।[23] ढेर प्राचीन आउ मध्यकालीन युगके कम्बोडियन मन्दिर, पत्थरके कला आउ नदीतलके नक्काशी पाएल गेलै हे जे पार्वती आअ शिवके समर्पित है ।[24][25] बोइसेलियर वियतनाममे उमाके साक्ष्यके खोज चम्पा युगके मन्दिरमे कैलन हे । [26] शिवके साथे पार्वतीके उमाके रूपमे समर्पित दर्जनो प्राचीन मन्दिर इण्डोनेशिया आउ मलेशियाके द्वीपमें पाएल गेलै हे । दुर्गाके रूपमे पार्वतीके अवतार दक्षिण-पूर्व एशियोमे पाएल गेलै हे ।[27] जावा (द्वीप)मे ढेर मन्दिर शिव-पार्वतीके समर्पित है जे पहिला सहस्राब्दी ईस्वीके दोसर छमाहीसे है आउ कुछ बादके शताब्दी के । [28] माँ दुर्गाके चिह्न आउ पूजाके साक्ष्य १०मा से १३मा शताब्दीके बीचके मिललै हे ।[29]
सन्दर्भ
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Archived 26 December 2014 at the वेबैक मशीन , Thesis, Department of History, University of Hong Kong - ↑ Peter Levenda (2011), Tantric Temples: Eros and Magic in Java, ISBN 978-0892541690 , pp 274
बाहरी कड़ी
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