Wp/mag/पाणिनि
पाणिनिके अष्टाध्यायी के १७मा शताब्दी के एक पाण्डुलिपि | |
| व्यक्तिगत जानकारी | |
|---|---|
| वृत्तिक जानकारी | |
| मुख्य कृतिसभ | अष्टाध्यायी |
| युग | चौथा शताब्दी ईसापूर्व;[1][2][3]; fl. ४००–३५० ईपू [4]; ६ठा–५मा शताब्दी ईपू[5][6] |
| क्षेत्र | भारतीय उपमहाद्वीपके उत्तरी-पश्चिमी भागे [note 1] |
| मुख्य विचार | व्याकरण, भाषाविज्ञान |
पाणिनि (७०० ई॰पू॰) संस्कृतभाषाके सबसे बड़ वैयाकरण होलन हे । इनकर जन्म तत्कालीन उत्तर पश्चिम भारतके गान्धारमे होलै हल । इनकर व्याकरणके नाम अष्टाध्यायी है जेकरा मे आठ अध्याय आउ लगभग चार सहस्र सूत्र है ।[8] संस्कृतभाषाके व्याकरण सम्मत रूप देवेमे पाणिनिके योगदान अतुलनीय मानल जा है । अष्टाध्यायी मात्र व्याकरण ग्रन्थ न है । एकरामे प्रकारान्तरसे तत्कालीन भारतीय समाजके पूरा चित्र मिलऽहै । ऊ समयके भूगोल, सामाजिक, आर्थिक, शिक्षा आउ राजनीतिक जीवन, दार्शनिक चिन्तन, खान-पान, रहन-सहन आदिके प्रसङ्ग स्थान-स्थान पर अङ्कित है ।
समयकाल
इनकर समयकाल अनिश्चित एवं विवादित है । एतना तय है कि छठा शताब्दी ईसा पूर्वके बाद आउ चौथा शताब्दी ईसापूर्वसे पहिलेके अवधि मे इनकर अस्तित्व रहलै होत । ऐसन मानल जा है कि इनकर जन्म पञ्जाब (पाकिस्थान) के शालातुला मे होलै हल जे आधुनिक पेशावर (पाकिस्थान) के भिरु है । इनकर जीवनकाल ५२०-४६० ईसा पूर्व मानल जा है ।
पाणिनिके जीवनकाल के नापेला यवनानी शब्दके उद्धरणके सहारा लेल जा है । एकर अर्थ यूनानके स्त्री या यूनानके लिपि से लगावल जा है । गान्धारमे यवनके बारेमे प्रत्यक्ष जानकारी सिकन्दरके आक्रमण के पहिले न हलै । सिकन्दर भारतमे ईसा पूर्व ३३० के आसपास ऐलै हल । पर ऐसन हो सकऽ है कि पाणिनिके फारसी यौन के जरिये यवन के जानकारी होतै आउ पाणिनि दारा प्रथम (शासनकाल - ५२१-४८५ ईसा पूर्व) के कालो मे हो सकऽ हथिन । प्लूटार्कके अनुसार सिकन्दर जखनि भारत ऐलै हल त एहाँ पहिलेसे कुछ यूनानी बस्ति हलै ।
कृति
१- अष्टाध्यायी (सूत्रपाठ) - एकरामे ८ अध्याय एवं कुल ३९९७ लगभग ४००० सूत्र है ।
२- धातुपाठ - ई १० गणमे विभक्त एवं लगभग २००० धातु है ।
३- गणपाठ- सूत्रपठित गणके पाठ ।
४- उणादिसूत्र - एकर पाणिनिकृत होवेमे बड़ी सन्देह है ।
५- लिङ्गानुशासन- लिङ्ग निर्धारण विषय ।
कात्यायन पाणिनिके सूत्र पर वार्तिक लिखलन । पतञ्जलि पाणिनिके अष्टाध्यायी पर अपन टिप्पणी लिखलन जेकरा महाभाष्यके नाम देयैलै (महा+भाष्य (समीक्षा, टिप्पणी, विवेचना, आलोचना)) ।
अन्य रचना
पाणिनिके दु साहित्यिक रचनो ला जानल जा है, यद्यपि ऊ अब प्राप्य न है ।
- जाम्बवती विजय आज एक अप्राप्य रचना है जेकर उल्लेख राजशेखर नामक व्यक्ति जह्लणके सूक्ति मुक्तावलीमे कैलन हे । एकर एक भाग रामयुक्तके नामलिङ्गानुशासनके टीको मे भेटऽ है ।
राजशेखर जह्लणके सूक्तिमुक्तावलीमे लिखलन हे:
- नमः पाणिनये तस्मै यस्मादाविर भूदिह।
- आदौ व्याकरणं काव्यमनु जाम्बवतीजयम् ॥
- पाताल विजय, जे आज अप्राप्य रचना है, जेकर उल्लेख नामिसाधु रुद्रटकृत काव्यालङ्कारके टीकामे कैलन हे ।
सन्दर्भ
- ↑ Vergiani 2017, पृ॰ 243, n.4.
- ↑ Bronkhorst 2016, पृ॰ 171.
- ↑ Houben 2009, पृ॰ 6.
- 1 2 Cardona 1997, पृ॰ 268.
- ↑ Staal 1996, पृ॰ 39.
- ↑ Scharfe 1977, पृ॰ 88.
- ↑ Staal 1965.
- ↑ "A reminder: Panini didn't destroy lingual diversities with his Sanskrit grammar, he unified them". मूल से 27 मई 2019 के पुरालेखित. अभिगमन तिथि 27 मई 2019.
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