Wp/mag/द्वैत वेदान्त
मध्वाचार्य द्वारा प्रतिपादित एवं उनकर अनुयायी द्वारा उपबृंहित द्वैतवाद रामानुजके विशिष्ट द्वैतवादसे बड़ी मिलैत-जुलैत है । मध्व बिन सङ्कोच द्वैतके प्रतिपादन करऽहथिन । अद्वैत वेदान्तके मध्व "मायावादी दानव' कहऽहथिन । इनकर अनुसार जगत्प्रवाह पाँच भेदसे समन्वित है- (१) जीव आउ ईश्वर मे, (२) जीव आउ जीव मे, (३) जीव आउ जड़ मे, (४) ईश्वर आउ जड़मे एवं (५) जड़ आउ जड़मे भेद स्वाभाविक है ।
संसार सत्य है आउ एकरामे होवेवाला भेदो सत्य है । वस्तुके स्वरूपे भेदमय है । ज्ञानमे हम्मनी वस्तुके अन्य वस्तुसे अलग करके एक विलक्षण रूपमे जानऽहिऐ । चूँकि ज्ञेय विषय भिन्न है अतः हमनीके ज्ञानो ज्ञेयके अनुसार भिन्न भिन्न होवऽहै ।
रामानुज नियन द्वैतवादोमे ईश्वर, चित् आउ अचित् ई तीन नित्य, परस्पर भिन्न तत्वके सत्य मानल गेलै हे । एकरा सबमेसे चित् आउ अचित् ईश्वराश्रित है । केवल ईश्वर अनाश्रित तत्व है । ऊ अनन्त सद्गुणसे युक्त है । ओही विश्वके स्रष्टा, पालक आउ संहारक है । ऊ दिव्य शरीरधारी विश्वातीत आऊ विश्वान्तर्यामी दुनो मानल गेल है । ईश्वर पूर्ण है- कर्मके अधिष्ठाता ईश्वर केवल भक्तिसे प्रसन्न होवऽहै । ऊ अवतार आउ व्यूह सबमे प्रकट होवऽहै एवं मूर्तीमे निवास करऽहै । ओकर सहचरी लक्ष्मी ओकरे नियन सर्वव्यापिनी है पर ओकर गुण लक्ष्मीपतिसे कुछ न्यून है । ओकरे ईश्वरके शक्ति कहल जा है । वेदके अध्ययनसे ईश्वरके स्वरूपके ज्ञान होवऽहै, अतः ऊ अनिर्वचनीय नै है । पर ओकरा पूर्ण रूपसे जानलो सहज नै है । ईश्वरके गुण अनन्त है, अतः ओकर सत्ता सीमित नै है- असीमताके कारण ओकर प्रत्यक्ष नै हो सकै । ओही ईश्वर विष्णु है । अपन इच्छासे ऊ विश्वके नियमन करऽहै- ऊ जीव आउ जड़के नया सिरासे बना नै सकै आउ नहीए उनकर विनाश कर सकऽहै । ऊ केवल निमित्त कारण है - उपादान कारण नै ।
जीवके सङ्ख्या अनन्त है आउ ऊ अणुरूप है । मूलतः ऊ चेतन आउ आनन्दमय नित्य तत्व है पर भौतिक शरीरके संसर्गसे एवं कर्मबन्धनसे ऊ दुख भुगतऽहै । ईश्वर जीवके अन्तर्यामी रूपसे नियन्ता है, तयो वास्तविक कर्ता, भोक्ता एवं कर्मके उत्तरदायी जीवे है । ज्ञानपूर्वक ईश्वरसे नित्य स्नेह कैल भक्ति है जेकरेसे जीव मुक्त हो सकऽहै । ई विश्वमे सब कुछ सजीव है - अणु अणु जीवसे व्याप्त है । निष्काम धर्मसे जीवके तत्वज्ञानमे सहायता भेटऽहै - ध्यानसे ईश्वरानुग्रहके लाभ होवऽहै आउ अन्तमे ओकरा ईश्वरके स्वरूपके अपरोक्ष ज्ञान हो जा है । जखनी ज्ञानके प्रतिष्ठा हो जा है, जीव बन्धमुक्त हो जा है । ईश्वर भिजुन वायुएके माध्यमसे पहुँचल जा सकऽहै । ईश्वरके अनुग्रह सबके नै भेटै - ऊ कुछ लोगके मुक्ति ला चुनऽहै, बाकी लोगके छोड़ दे है । जिनकर ऊ उनकर भक्तिके अनुसार मोक्ष दे है ऊ ईश्वरमे लीन नै होवै । उनकर केवल ईश्वरके सन्निधि भेटऽहै । मुक्त जीव ईश्वरके समानतो नै प्राप्त कर सकै । भक्तिके तीव्रताके अनुसार मुक्ति चार प्रकारके मानल गेलै हे - सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य आउ सायुज्य ।
ईश्वरके जखनि सृष्टि करेके इच्छा होवऽहै, मूल प्रकृति नाना भौतिक पदार्थके रूपमे अपन विकास करऽहै । सृष्टिके अर्थ है सूक्ष्मके स्थूल रूपमे परिणाम एवं जीवके कर्मानुसार फल देवे ला शरीरप्रदान । द्वैत वेदान्त अद्वैत-मत-परक वैदिक वाक्यके खींच तानके अर्थ निकालऽहै - जैसे "एकमेवाद्वितीयम्'के अर्थ होतै - ब्रह्मके समान कौनो दोसर नै है । एहीसे द्वैतवाद वेदके अपेक्षा आगम आउ पुराणके अधिक महत्व दे है ।