Wp/mag/जैन दर्शन
| जैनधर्म |
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प्रार्थना |
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मुख्य व्यक्तित्व |
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जैन दर्शन सबसे प्राचीन भारतीय दर्शनमे से एक है । एकरामे अहिंसाके सर्वोच्च स्थान देल गेलै हे । जैनधर्मके मान्यता अनुसार २४ तीर्थङ्कर समय-समय पर संसार चक्रमे फसल जीवके कल्याणला उपदेश देवे ई धरती पर आव हथिन । लगभग छठा शताब्दी ई॰ पू॰ मे अन्तिम तीर्थङ्कर महावीर द्वारा जैन दर्शनके पुनराव्रण होलै । जैन दर्शनके अनुसार जीव आउ कर्मके ई सम्बन्ध अनादि कालसे है । जखनि जीव ई सब कर्मके अपन आत्मासे सम्पूर्ण रूपसे मुक्त कर दे हे आउ ईश्वरके प्राप्त होव हे । एकराला ओकरा सम्यक पुरुषार्थ करे पड़ है । ई जैनधर्मके मौलिक मान्यता है ।
सत्यके अनुसन्धान करेवाला 'जैन' शब्दके व्युत्पत्ति ‘जिन’ से मानल गेलै हे जेकर अर्थ होव है- विजेता अर्थात् ऊ व्यक्ति जे इच्छा (कामना) एवं मन पर विजय प्राप्त करके हमेशाला संसारके आवागमनसे मुक्ति प्राप्त कर लेलकै हे । एही सब जिन के उपदेशके मानेवाला जैन आउ उनकर साम्प्रदायिक सिद्धान्त जैन दर्शनके रूपमे प्रख्यात होलै । जैन दर्शन ‘अर्हत दर्शन’ के नामोसे जानल जा है । जैनधर्ममे चोबीस तीर्थङ्कर (महापुरूष, जैनके ईश्वर) होलन जेकरामे प्रथम ऋषभदेव आउ अन्तिम महावीर (वर्धमान) होलन । कुछ तीर्थङ्करके नाम ऋग्वेदोमे मिल है जेकरासे इनकर प्राचीनता प्रमाणित होव है । आउ ऊ समय जैन दर्शन प्रभावो सिद्ध होव है । सम्पूर्ण भारतमे जैन अवशेषके प्राप्त होएल सम्पूर्ण भारतमे जैन दर्शनके प्रभावके दर्शाव है । मानल जा है कि सब दर्शन जैन दर्शनसे प्रभावित हलै ।
जैन दर्शनके प्रमुख ग्रन्थ प्राकृत (अर्धमागधी) भाषामे लिखल गेलै हे । बादमे कुछ जैन विद्धान संस्कृतोमे ग्रन्थ लिखलन । ओकरामे १०० ई॰ के आसपास उमास्वाती द्वारा रचित तत्त्वार्थ सूत्र बड़ महत्वपूर्ण ग्रन्थ है । ई पहिला ग्रन्थ है जेकरामे संस्कृतभाषाके माध्यमसे जैन सिद्धान्तके सब अङ्गके पूर्ण रूपसे वर्णन कैल गेलै हे । एकर पश्चात् अनेक जैन विद्वान संस्कृतमे व्याकरण, दर्शन, काव्य, नाटक आदिके रचना कैलन । संक्षेपमे इनकर सिद्धान्त ई प्रकार है - ओइसे ई कल्पना जैन समाजसे भिन्न है ।
द्रव्य

द्रव्य ऊ है जेकरामे गुण आउ पर्याय होवे - 'गुणपर्यायवद् द्रव्यम्' । गुण स्वरूप धर्म है आउ पर्याय आगन्तुक धर्म । ई सब धर्मके दु भेद है - (क) भावात्मक (ख) अभावात्मक । स्वरूपधर्म बिन द्रव्यके अस्तित्व सम्भव न । ई जगत् द्रव्यसे बनल है । द्रव्य सत् है काहेकि ओकरामे सत्ताके तीनो लक्षण उत्पत्ति, व्यय (क्षय) आउ नित्यता विद्यमान है । द्रव्यके दु रूप है - अस्तिकाय आउ अनस्तिकाय । अनस्तिकायके अमूर्त होवेसे एकरामे केवल कालेके गणना होव है जखनिकि अस्तिकायमे दु प्रकारके द्रव्य है - (क) जीव तथा (ख) अजीव । चेतन द्रव्य जीव अथवा आत्मा है । सांसारिक दशामे एही आत्मा जीव कहला है । जीवमे प्राण तथा शारीरिक, मानसिक आउ ऐन्द्रिक शक्ति है जेकरामे कार्यके प्रभावसे औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक, औदायिक तथा पारिमाणिक- ई पाँच भाव प्राणसे संयुक्त रह है । द्रव्यके रूप बदले पर एही ‘भावदशापन्न प्राण’ पुद्गल (डञ्जजमत) कहला है । ई प्रकार पुद्गल युक्त जीवे संसारी कहल जा है । जैन दर्शनानुसार जीव नित्य एवं स्वयंप्रकाश है । 'अविद्या' के कारण ऊ बन्धनमे बन्ध है । ई प्रकार जीवके दु भेद है - संसारी एवं मुक्त । संसारीके पुनः दु भेद स्थावर आउ जङ्गम है जेकरामे जङ्गम-पृथ्वीकाय, अपकाय, वायुकाय तथा तेजकाय वाला है । अस्तिकाय द्रव्यके दुसर तत्त्व ‘अजीव’ है जेकर पाँच भेद है - धर्म, अधर्म, आकाश, पुद्गल आउ काल ।
कर्म
जैन दर्शनमे कर्मके मुख्य आठ भेद बतावल गेलै हे - ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र आउ अन्तराय ।[1]
जैन दर्शनके अनुसार कर्म पौद्गलिक (शारीरिक) अर्थात् धूलके कणके समान जड़ पदार्थ है । ई राग, द्वेष आउ भ्रमसे प्रेरित मन, शरीर आउ वाक् के क्रिया तथा वासनासे पैदा होव है । कर्मके मुख्य रूपसे दु भेद है -
- घातीया जे पहिले नाशके प्राप्त होव है तथा
- अघातीया जेकि बादमे नाशके प्राप्त होव है ।
एकरामे से घातीया कर्मके चार भेद है -
- (क) ज्ञानावरणीय (ख) दर्शनावरणीय (ग) अन्तराय (प्रगतिमे बाधक) आउ (घ) मोहनीय ।
एही प्रकार अघातीया कर्मोके चार भेद है -
- (क) आयुष कर्म (ख) नाम कर्म (ग) गोत्र कर्म आउ (घ) वेदनीय कर्म ।
एही आठ प्रकारके कर्म संसार भ्रमणके कारण है ।
तत्त्व
जैन ग्रन्थमे सात तत्त्वके वर्णन मिल है । ई है -
जैन दर्शनके अनुसार कर्म पुदगल के जीव सत्तामे प्रवेश करेके आस्त्रव कहल जा है । आस्त्रव जीवके बन्धनके कारण है ।
- बन्ध: कर्म परमाणुके जीवसे बन्ध जाएल ।
- संवर जौन कारणसे कर्म बन्ध होवऽ है ओकरा रोकल
- निर्जराकर्मके एकदेश आत्मासे पृथक होएल
- मोक्ष कर्म रहित अवस्था (शुद्ध स्वरूप)
बन्ध
जीवके बन्धनके मूल कारण दूषित मनोभाव है । कषायके कारण जीवके पुद्गल (शरीर) से आक्रान्त हो जाएके बन्ध तत्त्व कहल गेलै हे । जीवके पुद्गलमे प्रवेशसे पहिले ‘भावास्रव’ पैदा होव है जेकि जीवके वास्तविक स्वरूप नष्ट कर दे है आउ जीव बन्धनमे फस जा है ।
मोक्ष
जीवके पुद्गलसे मुक्त होइले ‘मोक्ष’ है । ई मोक्ष दु प्रकारके है - भावमोक्ष आउ द्रव्यमोक्ष । भावमोक्षे जीवमुक्ति है । ई वास्तविक मोक्षसे पहिलेके अवस्था है । एकरामे चारो घातीया कर्मके नाश हो जा है । एकर बादे अघातीया कर्मके नाश होवेपर द्रव्य-मोक्षो प्राप्त हो जा है । जैन दर्शनके अनुसार मोक्ष प्राप्त करेला बारह अनुप्रेक्षा (जेकि वैराग्यके कारण है) से युक्त रहल आवश्यक है, जे ई प्रकार है - अनित्य, अषरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आस्रव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधिदुर्लभत्व तथा धर्मानुप्रेक्षा ।
जैनके ज्ञानमीमांसा तत्त्वमीमांसाके समाने स्वतन्त्र सत्ता रख है । ज्ञानमीमांसाके प्रामाणिक स्रोत प्रमाणके संख्या जैन दर्शनमे तीन है - प्रत्यक्ष, अनुमान तथा शब्द । जैन दार्शनिक ‘स्याद्वाद’ अर्थात् ‘सप्तभङ्गीनय’ के प्रतिपादन कर है -
- नयनामके तिष्ठानां प्रवृत्तेः श्रुतवर्त्मनि ।
- सम्पूर्णार्थविनिश्चायि स्याद्वाद श्रुतमुच्यते ॥ (न्यायावतार, ३०)
एकरा अनुसार हमनीके ज्ञान पूर्ण सत्य न कहल जा सकै । ज्ञान सदैव आपेक्षित सत्ये होव है । जैन दर्शनके स्याद्वादके सिद्धान्त प्रमुख है ।
अहिंसा
जैन दर्शनमे एकर सूक्ष्म विवेचन होलै हे । एकर एक मुख्य कारण ई है कि एकर प्ररूपण सर्वज्ञ-सर्वदर्शी (जिनकर ज्ञानसे संसारके कोनो बात लुकाएल न है, अनादि भूतकाल आउ अनन्त भविष्यके ज्ञाता-दृष्टा), वीतरागी (जिनका कोनो पर राग-द्वेष न है) प्राणी मात्रके हितेच्छुक, अनन्त अनुकम्पा युक्त जिनेश्वर भगवन्त द्वारा होलै हे । जिनकर बतावल मार्ग पर चलके प्रत्येक आत्मा अपन कल्याण कर सक है । जैन दर्शन धर्मके सार दया भाव मान है । ई प्रत्येक जीवके कल्याणके भाव दर्शाव है । जैन दर्शन कर्मेके जीवके संसार भ्रमणके कारण मान है । कर्मेके अनुसार जीवके गति सुख दुख प्राप्त होव है । अपन सुख आउ दुःखके कारण जीव स्वयं है, कोनो दुसर ओकरा दुखी करे न सकै । पुनर्जन्म, पूर्वजन्म, बन्ध-मोक्ष आदि जिनधर्म मान है । अहिंसा, सत्य, तप ई सब ई धर्मके मूल है ।
ब्रह्माण्ड विज्ञान
जैन दर्शन ई संसारके कोनो ईश्वर द्वारा बनावल स्वीकार न कर है । अपितु शाश्वत मान है । जनम मरण आदि जेयो होव है ओकरा नियन्त्रित करेवाला कोनो सार्वभौमिक सत्ता न है । जीव जैसे कर्म कर है, ओकरके परिणाम स्वरुप बेस या बुरा फलके भुगतेला ऊ मनुष्य, नरक, देव, एवं तिर्यञ्च (जानवर) योनिमे जन्म मरण करित रह है ।
एकरो देखथिन
सन्दर्भ