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काव्यशास्त्र काव्य आउ साहित्यके दर्शन आउ विज्ञान है । ई काव्यकृतिके विश्लेषणके आधार पर समय-समय पर उद्भावित सिद्धान्तके ज्ञानराशि है । काव्यशास्त्रला पुरान नाम 'साहित्यशास्त्र' आउ 'अलङ्कारशास्त्र' है आउ साहित्यके व्यापक रचनात्मक वाङ्मयके समेटे पर एकरा 'समीक्षाशास्त्र' भी कहल जाए लगलै । संस्कृत आलोचनाके अनेक अभिधानमे अलङ्कारशास्त्रे नितान्त लोकप्रिय अभिधान है । एकर प्राचीन नाममे 'क्रियाकलाप' (क्रिया काव्यग्रन्थ; कल्प विधान) वात्स्यायन द्वारा निर्दिष्ट ६४ कलामे से अन्यतम है। राजशेखर द्वारा उल्लिखित "साहित्य विद्या" नामकरण काव्यके भारतीय कल्पनाके ऊपरे आश्रित है, किन्तु ई नामकरण प्रसिद्ध न हो सकलै ।

युगानुरूप परिस्थितिके अनुसार काव्य आउ साहित्यके कथ्य आउ शिल्प बदलैत रहहै; फलतः काव्यशास्त्रीय सिद्धान्तोमे निरन्तर परिवर्तन होवित रहहै । भारतमे भरतके सिद्धान्तसे लेके आज तक आउ पश्चिममे सुकरात आउ ओकर शिष्य प्लेटोसे लेके अद्यतन "नवआलोचना' (नियो-क्रिटिसिज्म) तकके सिद्धान्तके ऐतिहासिक अनुशीलनसे ई बात साफ हो जा है । भारतमे काव्य नाटकादि कृतिके 'लक्ष्य ग्रन्थ' एवं सैद्धान्तिक ग्रन्थके 'लक्षण ग्रन्थ' कहल जा है । ई लक्षण ग्रन्थ सदा लक्ष्य ग्रन्थके पश्चाद्भावनी आउ अनुगामी है आउ महान्‌ कवि इनकर लीकके चुनौती देइत देखल जा हथिन ।

मूलतः काव्यशास्त्रीय चिन्तन शब्दकाव्य (महाकाव्य एवं मुक्तक) आउ दृश्यकाव्ये (नाटक) के सम्बन्धमे सिद्धान्त स्थिर करैत देखल जा है । अरस्तुके "पोयटिक्स" मे कामेडी, ट्रैजेडी आउ एपिक के समीक्षात्मक कसौटीके आकलन है आउ भरतके नाट्यशास्त्र केवल रूपक या दृश्यकाव्येके समीक्षाके सिद्धान्त प्रस्तुत करहै । भारत आउ पश्चिममे ई चिन्तन ईपू तीसरा चौथा शताब्दिए से प्रौढ़ रूपमे मिले लगहै जे ई बातके परिचायक है कि काव्यके विषयमे विचार विमर्श ढेर सदी पहिलहीँ शुरू हो गेलै हल ।

"अलङ्कारशास्त्र" मे अलङ्कार शब्दके प्रयोग व्यापक आउ सङ्कीर्ण दुनो अर्थमे बेझेके चाही । अलङ्कारके दु अर्थ मान्य है -

  • (१) अलङ्क्रियते अनेन इति अलङ्कारः ('काव्यमे शोभाके आधायक उपमा, रूपक आदि ; संकीर्ण अर्थ);
  • (२) अलङ्क्रियते इति अलङ्कारः ('काव्यके शोभा' ; व्यापक अर्थ) ।

व्यापक अर्थ स्वीकार करे पर अलङ्कारशास्त्र काव्यशोभाके आधाएक समस्त तत्व - गुण, रीति, रस, वृत्ति ध्वनि आदि - के विधायक शास्त्र है जेकरामे ई सब तत्वके स्वरूप आउ महत्त्वके रुचिर विवरण प्रस्तुत कैल गेलै हे । संकीर्ण अर्थमे ग्रहण करे पर ई नाम अपन ऐतिहासिक महत्त्वके अभिव्यक्त करहै ।

साहित्यशास्त्रके आरम्भिक युगमे "अलङ्कार" (उपमा, रूपक, अनुप्रास आदि) ही काव्यके सर्वस्व मानल जा हलै जेकर अभावमे काव्य उष्णताहीन अग्निके समान निष्प्राण आअ निर्जीव होवहै । "अलङ्कार" के गम्भीर विश्लेषणसे एक दन्ने "वक्रोक्ति" के तत्त्व उद्भूत होलै आउ दोसर दन्ने अर्थके समीक्षा करे पर "ध्वनि" के सिद्धान्तके स्पष्ट संकेत मिललै । एहीसे रस, ध्वनि, गुण आदि काव्यतत्वके प्रतिपादक होवहुँ पर, अलङ्कार प्राधान्य दृष्टिए के कारण, आलोचनाशास्त्रके नाम "अलङ्कारशास्त्र" पड़लै आउ ऊ लोकप्रियो होलै ।

एकरो देखथिन

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सन्दर्भ ग्रन्थ

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  • डॉ॰ एस.के. दे. : संस्कृत पोएटिक्स, भाग १-२;
  • पं. बलदेव उपाध्याय : भारतीय साहित्यशास्त्र, खण्ड १-२
  • विम्सार ऐंड ब्रुक्स : ए हिस्ट्री ऑव वेस्टर्न क्रिटिसिज्म़;
  • आई. ए. रिचर्ड्‌स : प्रिंसिपल्स ऑव लिटरेरी क्रिटिसिज्म;
  • स्काट : फाइन एप्रोचेज ऑव लिटरेरी क्रिटिसिज्म;
  • आर्थर कोयस्लर : दि ऐक्ट ऑव क्रिएशन;
  • रेने वेलक : थियरी ऑव लिटरेचर;
  • डेविड डेचीज : क्रिटिकल ऐप्रोचेज़ टु लिटरेचर।

बाहरी कड़ी

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