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Wp/mag/अष्टाध्यायी

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अष्टाध्यायी (अष्टाध्यायी = आठ अध्याय वाला) महर्षि पाणिनि द्वारा रचित संस्कृत व्याकरणके एक अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थ (८मा ई पू) है ।[1] एकरामे आठ अध्याय है । अष्टाध्यायी छौ वेदाङ्ग मे मुख्य मानल जा है । पतञ्जलिकृत महाभाष्यमे अष्टाध्यायीके "सर्ववेद-परिषद्-शास्त्र" कहल गेलै हे, अर्थात् अष्टाध्यायीके सम्बन्ध कौनो वेदविशेष तक सीमित न होके सब वैदिक संहितासे हलै आउ सबके प्रातिशरूय अभिमतके पाणिनि समादर कैलन हल । अष्टाध्यायीमे अनेक पूर्वाचार्यके मत आउ सूत्रके संनिवेश कैल गेलै । ओकरामे से शाकटायन, शाकल्य, अभिशाली, गार्ग्य, गालव, भारद्वाज, कश्यप, शौनक, स्फोटायन, चाक्रवर्मणके उल्लेख पाणिनि कैलन हे ।

अष्टाध्यायीके आठ अध्यायमे चार-चार पाद है; प्रत्येक पादमे ३८ से २२० तक सूत्र है । ई प्रकार अष्टाध्यायी मे आठ अध्याय, बत्तीस पाद आउ सब मिलाके लगभग ४००० सूत्र है । अष्टाध्यायी पर महामुनि कात्यायन के विस्तृत वार्तिक ग्रन्थ है आउ सूत्र एवं वार्तिक पर पतञ्जलिके विशद विवरणात्मक ग्रन्थ महाभाष्य है । सङ्क्षेपमे सूत्र, वार्तिक एवं महाभाष्य तीनो सम्मिलित रूप मे 'पाणिनीय व्याकरण' कहला है आउ सूत्रकार पाणिनि, वार्तिककार कात्यायन एवं भाष्यकार पतंजलि - तीनो व्याकरणके 'त्रिमुनि' कहला हथिन ।

अष्टाध्यायीमे ३१५५ सूत्र आउ आरम्भमे वर्णसमाम्नाय के १४ प्रत्याहार सूत्र है । अष्टाध्यायीके प्रथम सूत्र 'वृद्धिरादैच्' आउ अन्तिम सूत्र 'अ अ' है । अष्टाध्यायीके परिमाण एक सहस्र अनुष्टुप श्लोक के बराबर है ।

अष्टाध्यायीके समय

अष्टाध्यायीके कर्ता पाणिनि कहिआ होलन, ई विषयमे ढेर मत है । भण्डारकर आउ गोल्डस्टकर इनकर समय ७मा शताब्दी ईपू मानऽहथिन । मैकडानेल, कीथ आदि केत्ते विद्वान इनका चौथा शताब्दी ईपू मानलन हे । भारतीय अनुश्रुति के अनुसार पाणिनि नन्द के समकालीन हलन आउ ई समय ५मा शताब्दी ईपू होवेके चाही । पाणिनिमे शतमान, विंशतिक आउ कार्षापण आदि जौन मुद्रा के एक साथ उल्लेख है उनकर आधार पर एवं अन्य ढेर कारण से पाणिनिके काल एही समीचीन जान पड़ऽहै ।

सन्दर्भ

  1. "A reminder: Panini didn't destroy lingual diversities with his Sanskrit grammar, he unified them". मूल से 27 मई 2019 के पुरालेखित. अभिगमन तिथि 27 मई 2019.