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Template:हिन्दू धर्म सूचना मंजूषा वेद प्राचीन भारत केरऽ पवितत्रतम साहित्य छेकै । जे हिन्दू सब के प्राचीनतम आरू आधारभूत धर्मग्रन्थ भी छेकै । भारतीय संस्कृति में वेद सनातन वर्णाश्रमधर्म केरऽ मूल आरू सबसें प्राचीन ग्रन्थ छेकै जे ईश्वर केरऽ वाणी छेकै । ये विश्व के उन प्राचीनतम धार्मिक ग्रंथों में हैं जिनके पवित्र मन्त्र आज भी बड़ी आस्था और श्रद्धा से पढ़े और सुने जाते हैं।

'वेद' शब्द संस्कृत भाषा के विद् वेद शब्द बना है, इस तरह वेद का शाब्दिक अर्थ 'ज्ञान के ग्रंथ' है, इसी धातु से 'विदित' (जाना हुआ), 'विद्या'(ज्ञान), 'विद्वान' (ज्ञानी) जैसे शब्द आए हैं।


आज 'चतुर्वेद' के रूप में ज्ञात इन ग्रंथों का विवरण इस प्रकार है -

  • ऋग्वेद - सबसे प्राचीन वेद - ज्ञान हेतु लगभग १० हजार मंत्र। इसमें देवताओं के गुणों का वर्णन और प्रकाश के लिए मन्त्र हैं - सभी कविता-छन्द रूप में।
  • सामवेद - उपासना में गाने के लिये संगीतमय मन्त्र हैं - १९७५ मंत्र।
  • यजुर्वेद - इसमें कार्य (क्रिया), यज्ञ (समर्पण) की प्रक्रिया के लिये गद्यात्मक मन्त्र हैं- ३७५० मंत्र।
  • अथर्ववेद-इसमें गुण, धर्म,आरोग्य,यज्ञ के लिये कवितामयी मन्त्र हैं - ७२६० मंत्र। इसमे जादु-टोना की, मारण, मोहन, स्तम्भन आदि से सम्बद्ध मन्त्र भी है जो इससे पूर्व के वेदत्रयी मे नही हैं।

वेदों को अपौरुषेय (जिसे कोई व्यक्ति न कर सकता हो, यानि ईश्वर कृत) माना जाता है। यह ज्ञान विराटपुरुष से वा कारणब्रह्म से श्रुतिपरम्परा के माध्यम से सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने प्राप्त किया माना जाता है। इन्हें श्रुति भी कहते हैं जिसका अर्थ है 'सुना हुआ ज्ञान'। अन्य हिन्दू ग्रंथों को स्मृति कहते हैं यानि वेदज्ञ मनुष्यों की वेदानुगतबुद्धि या स्मृति पर आधारित ग्रन्थ। वेदके समग्रभागको मन्त्रसंहिता,ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद के रुपमें भी जाना जाता है।इनमे प्रयुक्त भाषा वैदिक संस्कृत कहलाती है जो लौकिक संस्कृत से कुछ अलग है। ऐतिहासिक रूप से प्राचीन भारत और हिन्द-आर्य जाति के बारे में वेदों को एक अच्छा सन्दर्भश्रोत माना जाता है। संस्कृत भाषा के प्राचीन रूप को लेकर भी इनका साहित्यिक महत्व बना हुआ है।

वेदों को समझना प्राचीन काल में भारतीय और बाद में विश्व भर में एक वार्ता का विषय रहा है। इसको पढ़ाने के लिए छः उपांगों की व्यवस्था थी। शिक्षा,कल्प,निरुक्त,व्याकरण,छन्द और ज्योतिष के अध्ययन के बाद ही प्राचीन काल में वेदाध्ययन पूर्ण माना जाता था | प्राचीन कालके ब्रह्मा,वशिष्ठ ,शक्ति,पराशर, वेदव्यास , जैमिनी, याज्ञवल्क्य, कात्यायन इत्यादि ऋषियों को वेदों का अच्छा ज्ञाता माना जाता है । मध्यकाल में रचित व्याख्याओं में सायण का रचा चतुर्वेदभाष्य "माधवीय वेदार्थदीपिका" बहुत मान्य है। यूरोप के विद्वानों का वेदों के बारे में मत हिन्द-आर्य जाति के इतिहास की जिज्ञासा से प्रेरित रही है । अतः वे इसमें लोगं, जगहों, पहाड़ों, नदियों के नाम ढूँढते रहते हैं - लेकिन ये भारतीय परंपरा और गुरुओं की शिक्षाओं से मेल नहीं खाता । अठारहवीं सदी उपरांत यूरोपियनों के वेदों और उपनिषदों में रूचि आने के बाद भी इनके अर्थों पर विद्वानों में असहमति बनी रही है।

वेद का हिंदी भाष्य

कालक्रम[edit | edit source]

मुख्य लेख वैदिक सभ्यता

वेद सबसे प्राचीन पवित्र ग्रंथों में से हैं। संहिता की तारीख लगभग 1700-1100 ईसा पूर्व, और "सर्कल-वैदिक" ग्रंथों के साथ-साथ संहिताओं की प्रतिदेय, सी की तिथि।[1] 1000-500 ईसा पूर्व, जिसके परिणामस्वरूप एक वैदिक अवधि होती है, जो मध्य 2 से लेकर मध्य 1000 ई.पू. तक फैली हुई है, या देर कांस्य युग और लोहे की आयु है। वेदिक काल, मंत्र ग्रंथों की रचना के बाद ही अपने चरम पर पहुंचता है, पूरे उत्तरी भारत में विभिन्न शाखाओं की स्थापना के साथ, जो कि ब्राह्मण के अर्थों के साथ मंत्र संहिताओं को उनके अर्थ की चर्चा करता है, और बुद्ध और पाणिनी की उम्र में इसका अंत पहुंचता है महाजनपदों का उदय (पुरातात्विक रूप से, उत्तरी काली पॉलिश वेयर)। माइकल विज़ेल सी का एक समय अवधि देता है 1500 से सी 500-400 ईसा पूर्व विट्ज़ेल ने 14 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के निकट पूर्वी मिटनी सामग्री के लिए विशेष संदर्भ में ऋग्वेद की अवधि के लिए इंडो-आर्यन समकालीन का एकमात्र शिलालेख दिया था। उन्होंने 150 ईसा पूर्व (पतंजलि) को सभी वैदिक संस्कृत साहित्य के लिए एक टर्मिनस एंटी क्वीन के रूप में, और 1200 ईसा पूर्व (प्रारंभिक आयरन आयु) अथर्ववेद के लिए टर्मिनस पोस्ट क्वीन के रूप में दिया।

वैदिक काल में ग्रंथों का संचरण मौखिक परंपरा द्वारा किया गया था, विस्तृत नैमनिक तकनीकों की सहायता से परिशुद्धता से संरक्षित किया गया था। मौर्य काल में बौद्ध धर्म के उदय के बाद वैदिक समय के बाद साहित्यिक परंपरा का पता लगाया जा सकता है, शायद 1 शताब्दी ईसा पूर्व के यजुर्वेद के कन्वा पाठ में सबसे पहले; हालांकि संचरण की मौखिक परंपरा सक्रिय रहा। विज़ेल ने 1 सहस्त्राब्दी बीसीई के अंत में लिखित वैदिक ग्रंथों की संभावना का सुझाव दिया। कुछ विद्वान जैसे जैक गूडी कहते हैं कि "वेद एक मौखिक समाज के उत्पाद नहीं हैं", इस दृष्टिकोण को ग्रीक, सर्बिया और अन्य संस्कृतियों जैसे विभिन्न मौखिक समाजों से साहित्य के संचरित संस्करणों में विसंगतियों की तुलना करके इस दृष्टिकोण का आधार रखते हुए, उस पर ध्यान देते हुए वैदिक साहित्य बहुत सुसंगत और विशाल है जिसे लिखी बिना, पीढ़ियों में मौखिक रूप से बना दिया गया था। हालांकि, गौडी कहते हैं, वैदिक ग्रंथों की एक लिखित और मौखिक परंपरा दोनों में शामिल होने की संभावना है, इसे "साक्षरता समाज के समानांतर उत्पादों" कहते हैं।

पांडुलिपि सामग्री (बर्च की छाल या ताड़ के पत्तों) की तात्कालिक प्रकृति के कारण, जीवित पांडुलिपियां शायद ही कुछ सौ वर्षों की उम्र को पार करती हैं। पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय का 14 वीं शताब्दी से ऋग्वेद पांडुलिपि है; हालांकि, नेपाल में कई पुरानी वेद पांडुलिपियां हैं जो 11 वीं शताब्दी के बाद से हैं।

प्राचीन विश्वविद्यालय[edit | edit source]

वेदों, वैदिक अनुष्ठान और उसके सहायक विज्ञान वेदंगा नामक थे, प्राचीन विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम का हिस्सा थे जैसे तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला।

वेद-भाष्यकार[edit | edit source]

प्राचीन काल में माना जाता है कि अग्नि, वायु, आदित्य और अङ्गिरा ऋषियों को वेदों का ज्ञान मिला जिसके बाद सात ऋषियों (सप्तर्षि) को ये ज्ञान मिला - इसका उल्लेख गीता में हुआ है। ऐतिहासिक रूप से ब्रह्मा, उनके पुत्र बादरायण और पौत्र व्यास और अन्य यथा जैमिनी, पतञ्जलि, मनु, वात्स्यायन, कपिल, कणाद आदि मुनियों को वेदों का अच्छा ज्ञान था। व्यास ऋषि ने गीता में कई बार वेदों (श्रुति ग्रंथों) का ज़िक्र किया है। अध्याय 2 में कृष्ण, अर्जुन से ये कहते हैं कि वेदों की अलंकारमयी भाषा के बदले उनके वचन आसान लगेंगे।[2] प्राचीन काल में ही निरूक्त, निघण्टु तथा मनुस्मृति को वेदों की व्याख्या मानते हैं।

मध्यकाल में सायणाचार्य को वेदों का प्रसिद्ध भाष्यकार मानते हैं - लेकिन साथ ही यह भी मानते हैं कि उन्होंने ही प्रथम बार वेदों के भाष्य या अनुवाद में देवी-देवता, इतिहास और कथाओं का उल्लेख किया जिसको आधार मानकार महीधर और अन्य भाष्यकारों ने ऐसी व्याख्या की। महीधर और उव्वट इसी श्रेणी के भाष्यकार थे।

आधुनिक काल में राजा राममोहन राय का ब्रह्म समाज और दयानन्द सरस्वती का आर्य समाज लगभग एक ही समय में (1860) वेदों के सबसे बड़े प्रचारक बने। इनके अतिरिक्त शंकर पाण्डुरंग ने सायण भाष्य के अलावे अथर्ववेद का चार जिल्दों में प्रकाशन किया। लोकमान्य तिलक ने ओरायन और द आर्कटिक होम इन वेदाज़ नामक दो ग्रंथ वैदिक साहित्य की समीक्षा के रूप में लिखे। बालकृष्ण दीक्षित ने सन् १८७७ में कलकत्ते से सामवेद पर अपने ज्ञान का प्रकाशन कराया। श्रीपाद दामोदर सातवलेकर ने सातारा में चारों वेदों की संहिता का श्रमपूर्वक प्रकाशन कराया। तिलक विद्यापीठ, पुणे से पाँच जिल्दों में प्रकाशित ऋग्वेद के सायण भाष्य के प्रकाशन को भी प्रामाणिक माना जाता है।

वैदिक संहिताओं के अनुवाद में रमेशचंद्र दत्त बंगाल से, रामगोविन्द त्रिवेदी एवं जयदेव वेदालंकार के हिन्दी में एवं श्रीधर पाठक का मराठी में कार्य भी लोगों को वेदों के बारे में जानकारी प्रदान करता रहा है। इसके बाद गायत्री तपोभूमि के श्रीराम शर्मा आचार्य ने भी वेदों के भाष्य प्रकाशित किये हैं - इनके भाष्य सायणाधारित हैं।

विदेशी प्रयास[edit | edit source]

सत्रहवीं सदी में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के भाई दारा शूकोह ने कुछ उपनिषदों का फ़ारसी में अनुवाद किया (सिर्र ए अकबर,سرّ اکبر महान रहस्य) जो पहले फ्रांसिसी और बाद में अन्य भाषाओं में अनूदित हुईं। यूरोप में इसके बाद वैदिक और संस्कृत साहित्य की ओर ध्यान गया। मैक्स मूलर जैसे यूरोपीय विद्वान ने भी संस्कृत और वैदिक साहित्य पर बहुत अध्ययन किया है। लेकिन यूरोप के विद्वानों का ध्यान हिन्द आर्य भाषा परिवार के सिद्धांत को बनाने और उसको सिद्ध करने में ही लगी हुई है। शब्दों की समानता को लेकर बने इस सिद्धांत में ऐतिहासिक तथ्य और काल निर्धारण को तोड़-मरोड़ करना ही पड़ता है। इस कारण से वेदों की रचना का समय १८००-१००० इस्वी ईसा पूर्व माना जाता है जो संस्कृत साहित्य और हिन्दू सिद्धांतों पर खरा नहीं उतरता। लेकिन आर्य जातियों के प्रयाण के सिद्धांत के तहत और भाषागत दृष्टि से यही काल इन ग्रंथों की रचना का मान लिया जाता है।

वेदों का काल[edit | edit source]

वेदों का अवतरण काल वर्तमान सृष्टि के आरंभ के समय का माना जाता है। इसके हिसाब से वेद को अवतरित हुए 2017(चैत्रशुक्ल/तपाःशुक्ल1) को 1,97,29,49,118 वर्ष होंगे। वेद अवतरण के पश्चात् श्रुति के रूप में रहे और काफी बाद में वेदों को लिपिबद्ध किया गया और वेदौंको संरक्षित करने अथवा अच्छि तरहसे समझनेके लिये वेदौंसे ही वेदांगौंको आविस्कार कीया गया। इसमें उपस्थित खगोलीय विवरणानुसार कई इतिहासकार इसे ५०००, ७००० साल पुराना मानते हैं परंतु आत्मचिंतन से ज्ञात होता है कि जैसे सात दिन बीत जाने पर पुनः रविवार आता है वैसे ही ये खगोलीय घटनाएं बार बार होतीं हैं अतः इनके आधार पर गणना श्रेयसकर नहीं।[3]

वेदों का महत्व[edit | edit source]

प्राचीन काल से भारत में वेदों के अध्ययन और व्याख्या की परम्परा रही है। वैदिक सनातन वर्णाश्रम(हिन्दू) धर्म अनुसार आर्षयुग में ब्रह्मा से लेकरवेदव्यासतथा जैमिनि तक के ऋषि-मुनियों और दार्शनिकौं ने शब्द,प्रमाण के रूप में इन्हीं को माने हैं और इनके आधार पर अपने ग्रन्थों का निर्माण भी किये हैं। पराशर, कात्यायन, याज्ञवल्क्य, व्यास, पाणिनी आदि को प्राचीन काल के वेदवेत्ता कहते हैं। वेदों के विदित होने यानि चार ऋषियों के ध्यान में आने के बाद इनकी व्याख्या करने की परम्परा रही है [4]।अतः फलस्वरूप एक ही वेदका स्वरुप भी मन्त्र,ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् के रुपमें चार ही माना गया है। इतिहास(महाभारत)पुराण आदि महान् ग्रन्थ वेदों का व्याख्यानके स्वरूपमें रचे गए। प्राचीन काल और मध्ययुग में शास्त्रार्थ इसी व्याख्या और अर्थांतर के कारण हुए हैं। मुख्य विषय - देव, अग्नि, रूद्र, विष्णु, मरुत, सरस्वती इत्यादि जैसे शब्दों को लेकर हुए। वेदवेत्ता महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती के विचार में ज्ञान, कर्म, उपासना और विज्ञान वेदों के विषय हैं। जीव, ईश्वर, प्रकृति इन तीन अनादि नित्य सत्ताओं का निज स्वरूप का ज्ञान केवल वेद से ही उपलब्ध होता है।

कणाद ने "तद्वचनादाम्नायस्य प्राणाण्यम्"[5] और "बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे" कहकर वेद को दर्शन और विज्ञान का भी स्रोत माना है। हिन्दू धर्म अनुसार सबसे प्राचीन नियमविधाता महर्षि मनु ने कहा वेदोऽखिलो धर्ममूलम् - खिलरहित वेद अर्थात् समग्रसंहिता,ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषदके रूपमें वेद ही धर्म वा धर्मशास्त्र का मूल आधार है। न केवल धार्मिक किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से भी वेदों का असाधारण महत्त्व है। वैदिक युग के आर्यों की संस्कृति और सभ्यताको जानने का एक ही वेद तो साधन है। मानव-जाति और विशेषतः वैदिकौंने अपने शैशव में धर्म और समाज का किस प्रकार विकास किया इसका ज्ञान केवल वेदों से मिलता है। विश्व के वाङ्मय में इनको प्राचीनतम ग्रन्थ( पुस्तक )माना सलोगन लेखन जाता है। [6] आर्यौंका-भाषाओं का मूलस्वरूप निर्धारित करने में वैदिक भाषा अत्यधिक सहायक सिद्ध हुई है।

यूनेस्को ने ७ नवम्बर २००३ को वेदपाठ को मानवता के मौखिक एवं अमूर्त विरासत की श्रेष्ठ कृति घोषित किया।

विवेचना[edit | edit source]

प्राचीन काल में, भारत में ही, इसकी विवेचना के अंतर के कारण कई मत बन गए थे। मध्ययुग में भी इसके भाष्य (व्याख्या) को लेकर कई शास्त्रार्थ हुए। वैदिक सनातन वर्णाश्रमी इसमें वर्णित चरित्रों देव को पूज्य और मूर्ति रूपक आराध्य समझते हैं जबकि दयानन्द सरस्वती सहित अन्य कईयों का मत है कि इनमें वर्णित चरित्र (जैसे अग्नि, इंद्र आदि) एकमात्र ईश्वर के ही रूप और नाम हैं। इनके अनुसार देवता शब्द का अर्थ है - (उपकार) देने वाली वस्तुएँ, विद्वान लोग और सूक्त मंत्र (और नाम) ना कि मूर्ति-पूजनीय आराध्य रूप।

वैदिक विवाद[edit | edit source]

यद्यपि आज के युग में हम सम्पूर्ण संसार में एकता-एकात्मता, प्रेम की भावना बना रहे हैं तथापि उस कालखण्ड में जब ब्रिटेन भारत पर शासन करता था, कुछ अांग्ल अनुवादको के द्वारा वेदों के अनुवाद से कई मिथक उत्पन्न हो गए। यह कोई दोष नहीं बल्कि सोंची समझी साजिश थी। उनका मुख्य कार्य भारत को खोखला करना और हिन्दुओं को ईसाई बनाना था[7][8]। उन आंग्ल अनुवादकों का कहना था, "आर्य विदेशी हैं। वो भारत आए और उन्होंने यहाँ रहने वाले लोगों को मारा, ताड़ित किया तथा यहाँ शासन किया। भारतीय लोग शिश्न (पुरुष जननांग) की पूजा किया करते थे, और दस्यु (अंग्रेजों के अनुसार दास या नीच। परंतु दस्यु का अर्थ है वह जो नास्तिक हो तथा जो कुकर्म करता हो। वो भी आर्य ही थे परंतु उनको उनके कर्मों से दस्यु या अनार्य की संज्ञा दी जाती थी[9][10]।) या दानव कहलाते थे।" परंतु उसी कालखण्ड के इतिहासकारों ने यह साबित कर दिया कि यह केवल मिथक ही है और इसमें रत्ती भर भी सच्चाई नहीं है और हडप्पा मोहनजो दड़ो के पूर्वज भी आर्य (वैदिक) ही थे[11][12][13][14]। मोहनजो दड़ो के वेदिक होने का प्रमाण खनन में प्राप्त मुद्राओं से ज्ञात हुआ जिसमें से एक का विवरण निम्न है। "Photostat Of Plate No. CXII Seal No. 387 excavations at Mohanjo-Daro.[15]" इस सील में जो चित्र बना है वह ऋग्वेद की एक ऋचा से पूर्णतया मेल खाता है। द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परि षस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति।।[16] कुछ देशभक्त जैसे बाल गंगाधर तिलक भी इन अंग्रेजों की बातों में आ गए और उटपुटांग ढंग से लिखने लगे। उनसे जब पूछा गया तो उन्होंने बताया कि वे तो जो कुछ लिखे, अंग्रेजों के वैदिक अनुवाद का अध्ययन करके ही लिखे[17]। भारत तो अब स्वतंत्र हो गया परंतु अंग्रेजों का बोया यह पौधा आज भी फल और फूल रहा है। ऐसी मूर्खता में भारतीय सरकार तथा लोग अब भी पड़े हैं इसका प्रमाण मुस्लिम इण्डिया का एक संस्करण है जो २७ मार्च सन् १९८५ में छपा। भारतीय विद्यालयों में यही बताया, पढ़ाया जाता रहा[18]; इसीसे भारत का भविष्य ज्ञात हो जाता है। इस विक्षिप्त विचारधारा से भारत स्वतंत्रता के पश्चात् भी संक्रमित है इसका प्रत्यक्ष प्रमाण तो श्रीमान् फ्रैंक एंन्थॉनी की नीची सोंच थी जिसे उन्होंने ४ सितंबर सन् १९७७ को संसद के सामने रखा[19]

वैदिक वाङ्ममय का वर्गीकरण[edit | edit source]

वैदिकौं का यह सर्वस्वग्रन्थ 'वेदत्रयी' के नाम से भी विदित है। पहले यह वेद ग्रन्थ एक ही था जिसका नाम यजुर्वेद था- एकैवासीद् यजुर्वेद चतुर्धाः व्यभजत् पुनः वही यजुर्वेद पुनः ऋक्-यजुस्-सामः के रूप मे प्रसिद्ध हुआ जिससे वह 'त्रयी' कहलाया | बाद में वेद को पढ़ना बहुत कठिन प्रतीत होने लगा, इसलिए उसी एक वेद के तीन या चार विभाग किए गए। तब उनको ऋग्यजुसामके रुपमे वेदत्रयी अथवा बहुत समय बाद ऋग्यजुसामाथर्व के रुप में चतुर्वेद कहलाने लगे। मंत्रों का प्रकार और आशय यानि अर्थ के आधार पर वर्गीकरण किया गया। इसका आधार इस प्रकार है -

वेदत्रयी[edit | edit source]

वैदिक परम्परा दो प्रकार के है - ब्रह्म परम्परा और आदित्य परम्परा। दोनो परम्परा के वेदत्रयी परम्परा प्राचीन काल मे प्रसिद्ध था। विश्व में शब्द-प्रयोग की तीन शैलियाँ होती है: पद्य (कविता), गद्य और गान। वेदों के मंत्रों के 'पद्य, गद्य और गान' ऐसे तीन विभाग होते हैं -

  1. वेद का पद्य भाग - ऋग्वेद
  2. वेद का गद्य भाग - यजुर्वेद
  3. वेद का गायन भाग - सामवेद

पद्य में अक्षर-संख्या तथा पाद एवं विराम का निश्चित नियम होता है। अतः निश्चित अक्षर-संख्या तथा पाद एवं विराम वाले वेद-मन्त्रों की संज्ञा 'ऋक्' है। जिन मन्त्रों में छन्द के नियमानुसार अक्षर-संख्या तथा पाद एवं विराम ऋषिदृष्ट नहीं है, वे गद्यात्मक मन्त्र 'यजुः' कहलाते हैं और जितने मन्त्र गानात्मक हैं, वे मन्त्र ‘'साम'’ कहलाते हैं। इन तीन प्रकार की शब्द-प्रकाशन-शैलियों के आधार पर ही शास्त्र एवं लोक में वेद के लिये ‘त्रयी’ शब्द का भी व्यवहार किया जाता है। यजुर्वेद गद्यसंग्रह है, अत: इस यजुर्वेद में जो ऋग्वेद के छंदोबद्ध मंत्र हैं, उनको भी यजुर्वेद पढ़ने के समय गद्य जैसा ही पढ़ा जाता है।

चतुर्वेद[edit | edit source]

द्वापरयुग की समाप्ति के पूर्व वेदों के उक्त चार विभाग अलग-अलग नहीं थे। उस समय तो ऋक्, यजुः और साम - इन तीन शब्द-शैलियोंमे संग्रहात्मक एक विशिष्ट अध्ययनीय शब्द-राशि ही वेद कहलाती थी। पीछे जाकर वेद के समकक्ष मे अथर्व भी सलग्न हो गया, फिर 'त्रयी' के जगह 'चतुर्वेद' कहलाने लगे | गुरु के रुष्ट होने पर जिन्होने सभी वेदौं को आदित्य से प्राप्त किया है उन याज्ञवल्क्य ने अपनी स्मृति मे वेदत्रयी के बाद और पुराणौं के आगे अथर्व को सम्मिलित कर बोला वेदाsथर्वपुराणानि इति .

वर्तमान काल में वेद चार हैं- लेकिन पहले ये एक ही थे। वर्तमान काल में वेद चार माने जाते हैं। परंतु इन चारों को मिलाकर एक ही 'वेद ग्रंथ' समझा जाता था।

एकैवासीत्यजुर्वेदस्तंचतुर्धाःव्यवर्तयत् -गरुड पुराण

लक्षणतः त्रयी होते हुये भी वेद एक ही था , फिर उसको चारभागमे बाँटा गया ।

एक एव पुरा वेद: प्रणव: सर्ववाङ्मय - महाभारत

अन्य नाम[edit | edit source]

सुनने से फैलने और पीढ़ी-दर-पीढ़ी याद रखने के कारण वा सृष्टिकर्ता ब्रहमाजीने भी अपौरुषेय वाणीके रुपमे प्राप्त करने के कारण श्रुति, स्वतः प्रमाण के कारण आम्नाय, पुरुष(जीव) भिन्न ईश्वरकृत होने से अपौरुषेय इत्यादि नाम वेदों के हैं।

वेद के पठन-पाठन के क्रम में गुरुमुख से श्रवण एवं याद करने का वेद के संरक्षण एवं सफलता की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्व है। इसी कारण वेद को ‘'श्रुति'’ भी कहते हैं। वेद परिश्रमपूर्वक अभ्यास द्वारा संरक्षणीय है, इस कारण इसका नाम ‘'आम्नाय’' भी है। वेदौं की रक्षार्थ महर्षियौं ने अष्ट विकृतियौंकी रचना की है -जटा माला शिखा रेखा ध्वजो दण्डो रथो घनः | अष्टौ विकृतयः प्रोक्तो क्रमपूर्वा महर्षयः || जिसके फलस्वरुप प्राचीन कालके तरह आज भी ह्रस्व, दीर्घ,प्लुत्त और उदात्त,अनुदात्त स्वरित आदिके अनुरुप मन्त्रोच्चारण होता है।

साहित्यिक दृष्टि से[edit | edit source]

इसके अनुसार प्रत्येक शाखा की वैदिक शब्द-राशि का वर्गीकरण- उपर वर्णित प्रत्येक वेद के चार भाग होते हैं। पहले भाग मन्त्रभाग (संहिता) के अलावा अन्य तीन भागको वेद न मान्नेवाले भी है लेकिन् ऐसा विचार तर्कपूर्ण सिद्ध होते नहि देखा गया हैं। अनादि वैदिक परम्परामें मन्त्र,ब्राह्मण,आरण्यक और उपनिषद एक ही वेदके चार अवयव है। कुल मिलाकर वेदके भाग ये हैं :-

उपर के चारौं खंड वेद होनेपर भी कुछलोग केवल 'संहिता' को ही वेद मानते हैं।

वर्गीकरण का इतिहास[edit | edit source]

द्वापरयुग की समाप्ति के समय श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यास जी ने यज्ञानुष्ठान के उपयोग को दृष्टिगत रखकर उस एक वेद के चार विभाग कर दिये और इन चारों विभागों की शिक्षा चार शिष्यों को दी। ये ही चार विभाग ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के नाम से प्रसिद्ध है। पैल, वैशम्पायन, जैमिनि और सुमन्तु नामक -चार शिष्यों को क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद की शिक्षा दी। इन चार शिष्यों ने शाकल आदि अपने भिन्न-भिन्न शिष्यों को पढ़ाया। इन शिष्यों के द्वारा अपने-अपने अधीन वेदों के प्रचार व संरक्षण के कारण वे वैदिक ग्रन्थ,चरण ,शाखा, प्रतिशाखा और अनुशाखा के माध्यम से बहुत रुपमे विस्तारित होगये | उन्हीं प्रचारक ऋषियौं के नाम से प्रसिद्ध हैं।

शाखा[edit | edit source]

पूर्वोक्त चार शिष्यौंने शुरुमे जितने शिष्यौंको अनुश्रवण कराया वे चरणसमुह कहलाये | प्रत्येक चरणसमुहमे बहुतसे शाखा होते है। और इसी तरह प्रतिशाखा,अनुशाखा आदि बन गए । वेद की अनेक शाखाएं यानि व्याख्यान का तरीका बतायी गयी हैं। ऋषि पतञ्जलि के महाभाष्य के अनुसार ऋग्वेद की 21, यजुर्वेद की 101, सामवेद की 1001, अर्थववेद की 9 इस प्रकार 1131 शाखाएं हैं परन्तु आज 12 शाखाएं ही मूल ग्रन्थों में उपलब्ध हैं। वेद की प्रत्येक शाखा की वैदिक शब्दराशि चार भागों में उपलब्ध है: 1. संहिता 2. ब्राह्मण 3. आरण्यक 4. उपनिषद्कुछ लोग इनमें संहिता को ही वेद मानते हैं। शेष तीन भाग को वेदों के व्याख्या ग्रन्थ मानते हैं। अलग शाखाओं में मूल संहिता तो वही रहती हैं लेकिन आरण्यक और ब्राह्मण ग्रंथों में अन्तर आ जाता है। कइ मंत्र भाग में भी उपनिषद मिलता है जैसा कि शुक्लयजुर्वेद मन्त्रभागमें इसावास्योपनिषद| पुराने समय में जितनी शाखाएं थी उतनी ही मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद होते थे |इतनी शाखाओं के बाबजुद भी आजकल कुल ९ शाखाओं के ही ग्रंथ मिलते हैं। अन्य शाखाऔंमे किसीके मन्त्र,किसीके ब्राह्मण,किसीके आरण्यक और किसीके उपनिषद ही पाया जाता है।इतने ही नही अधिक शाखाऔंके तो उपनिषद ही पाया जाता है ,तभी तो उपनिषद अधिक मिलते हैं।

वेदों के विषय[edit | edit source]

वैदिक ऋषियौ ने वेदों को जनकल्याणमे प्रवृत्त पाया । निस्संदेह जैसा कि -:यथेमां वाचं कल्याणिमावदानि जनेभ्यः वैसा ही वेदा हि यज्ञार्थमभिप्रवृत्ता कालानुपूर्व्याभिहिताश्च यज्ञाः तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं यो ज्योतिषं वेद स वेद यज्ञम् वेदौं की प्रवृत्तिः जनकल्यण के कार्य मे है । वेद शब्द विद् धातु में घञ् प्रत्यय लगने से बना है । संस्कृत ग्रथों में विद् ज्ञाने और विद्‌ लाभे जैसे विशेषणों से विद् धातु से ज्ञान और लाभ के अर्थ का बोध होता है ।

वेदों के विषय उनकी व्याख्या पर निर्भर करते हैं - अग्नि, यज्ञ, सूर्य, इंद्र (आत्मा तथा बिजली के अर्थ में), सोम, ब्रह्म, मन-आत्मा, जगत्-उत्पत्ति, पदार्थों के गुण, धर्म (उचित-अनुचित), दाम्पत्य, ध्यान-योग, प्राण (श्वास की शक्ति) जैसे विषय इसमें बारंबार आते हैं । यज्ञ में देवता, द्रव्य, उद्देश्य,और विधि आदि विनियुक्त होते हैं। ग्रंथों के हिसाब से इनका विवरण इस प्रकार है -

ऋग्वेद[edit | edit source]

ऋग्वेद को चारों वेदों में सबसे प्राचीन माना जाता है। इसको दो प्रकार से बाँटा गया है। प्रथम प्रकार में इसे 10 मण्डलों में विभाजित किया गया है। मण्डलों को सूक्तों में, सूक्त में कुछ ऋचाएं होती हैं। कुल ऋचाएं 10520 हैं। दूसरे प्रकार से ऋग्वेद में 64 अध्याय हैं। आठ-आठ अध्यायों को मिलाकर एक अष्टक बनाया गया है। ऐसे कुल आठ अष्टक हैं। फिर प्रत्येक अध्याय को वर्गों में विभाजित किया गया है। वर्गों की संख्या भिन्न-भिन्न अध्यायों में भिन्न भिन्न ही है। कुल वर्ग संख्या 2024 है। प्रत्येक वर्ग में कुछ मंत्र होते हैं। सृष्टि के अनेक रहस्यों का इनमें उद्घाटन किया गया है। पहले इसकी 21 शाखाएं थीं परन्तु वर्तमान में इसकी शाकल शाखा का ही प्रचार है।

यजुर्वेद[edit | edit source]

इसमें गद्य और पद्य दोनों ही हैं। इसमें यज्ञ कर्म की प्रधानता है। प्राचीन काल में इसकी 101 शाखाएं थीं परन्तु वर्तमान में केवल पांच शाखाएं हैं - काठक, कपिष्ठल, मैत्रायणी, तैत्तिरीय, वाजसनेयी। इस वेद के दो भेद हैं - कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद। कृष्ण यजुर्वेद का संकलन महर्षि वेद व्यास ने किया है। इसका दूसरा नाम तैत्तिरीय संहिता भी है। इसमें मंत्र और ब्राह्मण भाग मिश्रित हैं। शुक्ल यजुर्वेद - इसे सूर्य ने याज्ञवल्क्य को उपदेश के रूप में दिया था। इसमें 15 शाखाएं थीं परन्तु वर्तमान में माध्यन्दिन को जिसे वाजसनेयी भी कहते हैं प्राप्त हैं। इसमें 40 अध्याय, 303 अनुवाक एवं 1975 मंत्र हैं। अन्तिम चालीसवां अध्याय ईशावास्योपनिषद है।

सामवेद[edit | edit source]

यह गेय ग्रन्थ है। इसमें गान विद्या का भण्डार है, यह भारतीय संगीत का मूल है। ऋचाओं के गायन को ही साम कहते हैं। इसकी 1001 शाखाएं थीं। परन्तु आजकल तीन ही प्रचलित हैं - कोथुमीय, जैमिनीय और राणायनीय। इसको पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक में बांटा गया है। पूर्वार्चिक में चार काण्ड हैं - आग्नेय काण्ड, ऐन्द्र काण्ड, पवमान काण्ड और आरण्य काण्ड। चारों काण्डों में कुल 640 मंत्र हैं। फिर महानाम्न्यार्चिक के 10 मंत्र हैं। इस प्रकार पूर्वार्चिक में कुल 650 मंत्र हैं। छः प्रपाठक हैं। उत्तरार्चिक को 21 अध्यायों में बांटा गया। नौ प्रपाठक हैं। इसमें कुल 1225 मंत्र हैं। इस प्रकार सामवेद में कुल 1875 मंत्र हैं। इसमें अधिकतर मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं। इसे उपासना का प्रवर्तक भी कहा जा सकता है।

अथर्ववेद[edit | edit source]

इसमें गणित, विज्ञान, आयुर्वेद, समाज शास्त्र, कृषि विज्ञान, आदि अनेक विषय वर्णित हैं। कुछ लोग इसमें मंत्र-तंत्र भी खोजते हैं। यह वेद जहां ब्रह्म ज्ञान का उपदेश करता है, वहीं मोक्ष का उपाय भी बताता है। इसे ब्रह्म वेद भी कहते हैं। इसमें मुख्य रूप में अथर्वण और आंगिरस ऋषियों के मंत्र होने के कारण अथर्व आंगिरस भी कहते हैं। यह 20 काण्डों में विभक्त है। प्रत्येक काण्ड में कई-कई सूत्र हैं और सूत्रों में मंत्र हैं। इस वेद में कुल 5977 मंत्र हैं। इसकी आजकल दो शाखाएं शौणिक एवं पिप्पलाद ही उपलब्ध हैं। अथर्ववेद का विद्वान् चारों वेदों का ज्ञाता होता है। यज्ञ में ऋग्वेद का होता देवों का आह्नान करता है, सामवेद का उद्गाता सामगान करता है, यजुर्वेद का अध्वर्यु देव:कोटीकर्म का वितान करता है तथा अथर्ववेद का ब्रह्म पूरे यज्ञ कर्म पर नियंत्रण रखता है।

उपवेद[edit | edit source]

Template:मुख्य आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद तथा स्थापत्यवेद- ये क्रमशः चारों वेदों के उपवेद कात्यायन ने बतलाये हैं।

  1. स्थापत्यवेद - स्थापत्यकला के विषय, जिसे वास्तु शास्त्र या वास्तुकला भी कहा जाता है, इसके अन्तर्गत आता है।
  2. धनुर्वेद - युद्ध कला का विवरण। इसके ग्रंथ विलुप्त प्राय हैं।
  3. गन्धर्वेद - गायन कला।
  4. आयुर्वेद - वैदिक ज्ञान पर आधारित स्वास्थ्य विज्ञान।

वेद के अंग, उपांग[edit | edit source]

Template:मुख्य वेदों के सर्वांगीण अनुशीलन के लिये शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष के ग्रन्थ हैं जिन्हें ६ अंग कहते हैं। प्रतिपदसूत्र, अनुपद, छन्दोभाषा (प्रातिशाख्य), धर्मशास्त्र, न्याय तथा वैशेषिक- ये ६ दर्शऩ उपांग ग्रन्थ भी उपलब्ध है। उपांगों के विषय इस प्रकार हैं -

  1. शिक्षा - ध्वनियों का उच्चारण।
  2. व्याकरण - संधि, समास, उपमा, विभक्ति आदि का विवरण। वाक्य निर्माण को समझने के लिए आवश्यक।
  3. ज्योतिष - आकाशीय पिंडों (सूर्य, पृथ्वी, नक्षत्रों) की गति और स्थिति का ज्ञान। इसमें वेदांगज्योतिष नामक ग्रन्थ प्रत्येक वेदके अलग अलग थे | अब लगधमुनि प्रोक्त चारौं वेदौंके वेदांगज्योतिषौंमे दो ग्रन्थ ही पाया जाता है -एक आर्च पाठ और दुसरा याजुस् पाठ | इस ग्रन्थमे सोमाकर नामक विद्वानके प्राचीन भाष्य मीलता है साथ ही कौण्डिन्न्यायन संस्कृत व्याख्या भी मीलता है।
  4. कल्प - यज्ञ के लिए विधिसूत्र। इसके अन्तर्गत श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र,धर्मसूत्र और शुल्बसूत्र |वेदोक्त कार्य सम्पन्न करना और समर्पण करनेमे इनका महत्व है।
  5. निरुक्त - शब्दों का मूल भाव। यह व्याकरण से अलग है - इस अर्थ में कि इनसे वस्तुओं का ऐसा नाम किस लिये आया इसका विवरण है। शब्द-मूल और शब्द-संधि निरुक्त और व्याकरण के विषय हैं।
  6. छन्द - गायन या मंत्रोच्चारण के लिए आघात और लय के लिए निर्देश।

वैदिक स्वर प्रक्रिया[edit | edit source]

Template:मुख्य

thumb|right|400px|वैदिक स्वर लिखने की कला - देवनागरी लिपि में

वेद की संहिताओं में मंत्राक्षरों में खड़ी तथा आड़ी रेखायें लगाकर उनके उच्च, मध्यम, या मन्द संगीतमय स्वर उच्चारण करने के संकेत किये गये हैं। इनको उदात्त, अनुदात्त ऒर स्वारित के नाम से अभिहित किया गया है। ये स्वर बहुत प्राचीन समय से प्रचलित हैं और महामुनि पतंजलि ने अपने महाभाष्य में इनके मुख्य मुख्य नियमों का समावेश किया है।

स्वरों को अधिक या न्यून रूप से बोले जाने के कारण इनके भी दो-दो भेद हो जाते हैं। जैसे उदात्त-उदात्ततर, अनुदात्त-अनुदात्ततर, स्वरित-स्वरितोदात्त। इनके अलावे एक और स्वर माना गया है - श्रुति - इसमें तीनों स्वरों का मिलन हो जाता है। इस प्रकार कुल स्वरों की संख्या ७ हो जाती है। इन सात स्वरों में भी आपस में मिलने से स्वरों में भेद हो जाता है जिसके लिए स्वर चिह्नों में कुछ परिवर्तन हो जाता है। यद्यपि इन स्वरों के अंकण और टंकण में कई विधियाँ प्रयोग की जाती हैं और प्रकाशक-भाष्यकारों में कोई एक विधा सामान्य नहीं है, अधिकांश स्थानों पर अनुदात्त के लिए अक्षर के नीचे एक आड़ी लकीर तथा स्वरित के लिए अक्षर के ऊपर एक खड़ी रेखा बनाने का नियम है। उदात्त का अपना कोई चिह्न नहीं है। इससे अंकण में समस्या आने से कई लेखक-प्रकाशक स्वर चिह्नों का प्रयोग ही नहीं करते।

वैदिक छंद[edit | edit source]

Template:Main वैदिक मंत्रों में प्रयुक्त छंद कई प्रकार के हैं जिनमें मुख्य हैं Template:Cn-

  1. गायत्री - सबसे प्रसिद्ध छंद।आठ वर्णों (मात्राओं) के तीन पाद। गीता में भी इसके सर्वोत्तम बताया गया है (ग्यारहवें अध्याय में)। इसी में प्रसिद्ध गायत्री मंत्र ढला है।
  2. त्रिष्टुप - ११ वर्णों के चार पाद - कुल ४४ वर्ण।
  3. अनुष्टुप - ८ वर्णों के चार पाद, कुल ३२ वर्ण। वाल्मीकि रामायण तथा गीता जैसे ग्रंथों में भई इस्तेमाल हुआ है। इसी को श्लोक भी कहते हैं।
  4. जगती - ८ वर्णों के ६ पाद, कुल ४८ वर्ण।
  5. बृहती- ८ वर्णों के ४ पाद कुल ३२ वर्ण
  6. पंक्ति- ४ या ५ पाद कुल ४० अक्षर २ पाद के बाद विराम होता है पादों में अक्षरों की संख्याभेद से इसके कई भेद हैं
  7. उष्णिक- इसमें कुल २८ वर्ण होते हैं तथा कुल ३ पाद होते हैं २ में आठ आठ वर्ण तथा तीसरे में १२ वर्ण होते हैं दो पद के बाद विराम होता है बढे हुए अक्षरों के कारन इसके कई भेद होते हैं

वेद की शाखाएँ[edit | edit source]

Template:मुख्य इसके अनुसार वेदोक्त यज्ञों का अनुष्ठान ही वेद के शब्दों का मुख्य उपयोग माना गया है। सृष्टि के आरम्भ से ही यज्ञ करने में साधारणतया मन्त्रोच्चारण की शैली, मन्त्राक्षर एवं कर्म-विधि में विविधता रही है। इस विविधता के कारण ही वेदों की शाखाओं का विस्तार हुआ है। यथा-ऋग्वेद की २१ शाखा, यजुर्वेद की १०१ शाखा, सामवेद की १००० शाखा और अथर्ववेद की ९ शाखा- इस प्रकार कुल १,१३१ शाखाएँ हैं। इस संख्या का उल्लेख महर्षि पतञ्जलि ने अपने महाभाष्य में भी किया है। उपर्युक्त १,१३१ शाखाओं में से वर्तमान में केवल १२ शाखाएँ ही मूल ग्रन्थों में उपलब्ध हैः-

  1. ऋग्वेद की २१ शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त हैं- शाकल-शाखा और शांखायन शाखा
  2. यजुर्वेद में कृष्णयजुर्वेद की ८६ शाखाओं में से केवल ४ शाखाओं के ग्रन्थ ही प्राप्त है- तैत्तिरीय-शाखा, मैत्रायणीय शाखा, कठ-शाखा और कपिष्ठल-शाखा
  3. शुक्लयजुर्वेद की १५ शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ग्रन्थ ही प्राप्त है- माध्यन्दिनीय-शाखा और काण्व-शाखा
  4. सामवेद की १,००० शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त है- कौथुम-शाखा और जैमिनीय-शाखा
  5. अथर्ववेद की ९ शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त हैं- शौनक-शाखा और पैप्पलाद-शाखा

उपर्युक्त १२ शाखाओं में से केवल ६ शाखाओं की अध्ययन-शैली प्राप्त है-शाकल, तैत्तरीय, माध्यन्दिनी, काण्व, कौथुम तथा शौनक शाखा। यह कहना भी अनुपयुक्त नहीं होगा कि अन्य शाखाओं के कुछ और भी ग्रन्थ उपलब्ध हैं, किन्तु उनसे शाखा का पूरा परिचय नहीं मिल सकता एवं बहुत-सी शाखाओं के तो नाम भी उपलब्ध नहीं हैं।

अन्य मतों की दृष्टि में वेद[edit | edit source]

जैसा कि उपर लिखा है, वेदों के कई शब्दों का समझना उतना सरल नहीं रहा है। वेदौंका वास्तविक अर्थ समझने के लिए इनके भितरसे ही वेदांगौंका आविस्कार कीया गया | इसकी वजह इनमें वर्णित अर्थों को जाना नही जा सकता | सबसे अधिक विवाद-वार्ता ईश्वर के स्वरूप, यानि एकमात्र या अनेक देवों के सदृश्य को लेकर हुआ है। वेदौंके वास्तविक अर्थ वही कर सकता है जोवेदांग- शिक्षा,कल्प, व्याकरण, निरुक्त,छन्द और ज्योतिषका ज्ञाता है। यूरोप के संस्कृत विद्वानों की व्याख्या भी हिन्द-आर्य जाति के सिद्धांत से प्रेरित रही है। प्राचीन काल में ही इनकी सत्ता को चुनौती देकर कई ऐसे मत प्रकट हुए जो आज भी धार्मिक मत कहलाते हैं लेकिन कई रूपों में भिन्न हैं। इनका मुख्य अन्तर नीचे स्पष्ट किया गया है। उनमे से जिसका अपना अविच्छिन्न परम्परासे वेद,शाखा,और कल्पसूत्रौं से निर्देशित होकर एक अद्वितीय ब्रह्मतत्वको ईस्वर मानकर किसी एक देववादमे न उलझकर वेदवादमे रमण करते हैं वे वैदिक सनातन वर्णाश्रम धर्म मननेवाले है वे ही वेदौंको सरवोपरी मानते है। इसके अलावा अलग अलग विचार रखनेवाले और पृथक् पृथक् देवता मानने वाले कुछ सम्प्रदाय ये हैं-:

  • जैन - इनको मूर्ति पूजा के प्रवर्तक माना जाता है। ये वेदों को श्रेष्ठ नहीं मानते पर अहिंसा के मार्ग पर ज़ोर देते हैं।
  • बौद्ध - इस मत में महात्मा बुद्ध के प्रवर्तित ध्यान और तृष्णा को दुःखों का कारण बताया है। वेदों में लिखे ध्यान के महत्व को ये तो मानते हैं पर ईश्वर की सत्ता से नास्तिक हैं। ये भी वेद नही मानते |
  • शैव - वेदों में वर्णित रूद्र के रूप शिव को सर्वोपरि समझने वाले। अपनेको वैदिक धर्म के मानने वाले शिव को एकमात्र ईश्वर का कल्याणकारी रूप मानते हैं, लेकिन शैव लोग शंकर देव के रूप (जिसमें नंदी बैल, जटा, बाघंबर इत्यादि हैं) को विश्व का कर्ता मानते हैं।
  • वैष्णव - विष्णु और उनके अवतारों को ईश्वर मानने वाले। वैदिक ग्रन्थौं से अधिक अपना आगम मतको सर्वोपरीमानते है। विष्णु को ही एक ईश्वर बताते हैं और जिसके अनुसार सर्वत्र फैला हुआ ईश्वर विष्णु कहलाता है।
  • शाक्त अपनेको वेदोक्त मानते तो है लेकिन् पूर्वोक्त शैव,वैष्णवसे श्रेष्ठ समझते है ,महाकाली,महालक्ष्मी और महासरस्वतीके रुपमे नवकोटी दुर्गाको इष्टदेवता मानते है वे ही सृष्टिकारिणी है ऐसा मानते है।
  • सौर जगतसाक्षी सूर्यको और उनके विभिन्न अवतारौंको ईस्वर मानते है।वे स्थावर और जंगमके आत्मा सूर्य ही है ऐसा मानते है।
  • गाणपत्य गणेश को ईश्वर समझते है। साक्षात् शिवादि देवौं ने भी उनकी उपासना करके सिद्धि प्राप्त किया है, ऐसा मानते हैं।
  • सिख - इनका विश्वास एकमात्र ईश्वर में तो है, लेकिन वेदों को ईश्वर की वाणी नहीं समझते हैं।
  • आर्य समाज - ये निराकार ईश्वर के उपासक हैं। ये वेद को ईश्वरीय ज्ञान तो मानते हैं लेकिन वेदांगौं को और वेदौं के व्याख्या के रूप मे प्राचीन वैदिकौं से स्वीकारा गया ईतिहास (रामायण-महाभारत) और पुराणौं के कटु आलोचक तथा विरोधी भी है। ये अर्वाचीन वैदिक है।

जिन विषयों पर विवाद रहा है उनका वर्णन नीचे दिया है।

यज्ञ: यज्ञ के वर्तमान रूप के महत्व को लेकर कई विद्वानों, मतों और भाष्कारों में विरोधाभाष है। यज्ञ में आग के प्रयोग को प्राचीन पारसी पूजन विधि के इतना समान होना और हवन की अत्यधिक महत्ता के प्रति विद्वानों में रूचि रही है।

देवता: देव शब्द का लेकर ही कई विद्वानों में असहमति रही है। वेदोक्त निर्गुण- निराकार और सगुण- साकार मे से अन्तिम पक्षको मानने वाले कई मतों में (जैसे- शैव, वैष्णव और शाक्त सौर गाणपत,कौमार) इसे महामनुष्य के रूप में विशिष्ट शक्ति प्राप्त साकार चरित्र मसझते हैं और उनका मूर्ति रूप में पूजन करते हैं तो अन्य कई इन्हें ईश्वर (ब्रह्म, सत्य) के ही नाम बताते हैं। परोपकार (भला) करने वाली वस्तुएँ (यथा नदी, सूर्य), विद्वान लोग और मार्गदर्शन करने वाले मंत्रों को देव कहा गया है।

उदाहरणार्थ अग्नि शब्द का अर्थ आग न समझकर सबसे आगे यानि प्रथम यानि परमेश्वर समझते हैं। देवता शव्द का अर्थ दिव्य, यानि परमेश्वर (निराकार, ब्रह्म) की शक्ति से पूर्ण माना जाता है - जैसे पृथ्वी आदि। इसी मत में महादेव, देवों के अधिपति होने के कारण ईश्वर को कहते हैं। इसी तरह सर्वत्र व्यापक ईश्वर विष्णु और सत्य होने के कारण ब्रह्मा कहलाता है। इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और महादेव किसी चरित्र के नाम नहीं बल्कि ईश्वर के ही नाम है। व्याकरण और निरुक्तके वलपर ही वैदिक और लौकिक शब्दौंके अर्थ निर्धारण कीया जाता है। इसके अभावमे अर्थके अनर्थ कर बैठते है। [20] इसी प्राकर गणेश (गणपति), प्रजापति, देवी, बुद्ध, लक्ष्मी इत्यादि परमेश्वर के ही नाम हैं। वेदादि शास्त्रौंमे आए विभन्न एक ही परमेश्वरके है। जैसा की उपनिषदौंमे कहा गया है- एको देव सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा | कुछ लोग ईश्वरके सगुण- निर्गुण स्वरुपमे झगडते रहते है। इनमेसे कोई मूर्तिपूजा करते है और कोई ऐसे लोग है जो मूर्तिपूजा के विरूद्ध हैं और ईश्वर को एकमात्र सत्य, सर्वोपरि समझते हैं।

अश्वमेध: अश्वमेध से हिंसा और बलि का विचार आता है। यह कई हिन्दुओं को भी आश्चर्यजनक लगता है क्योंकि कई स्थानों पर शुद्धतावादी हिंसा (और मांस भक्षण) से परहेज करते रहे हैं। कईयों का मानना है कि मेध शब्द में अध्वरं का भी प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ है अहिंसा। अतः मेध का भी अर्थ कुछ और रहा होगा। इसी प्रकार अश्व शब्द का अर्थ घोड़ा न रहकर शक्ति रहा होगा। श्रीराम शर्मा आचार्य कृत भाषयों के अनुसार अश्व शब्द का अर्थ शक्ति, गौ शब्द का अर्थ पोषण है। इससे अश्वमेध का अर्थ घोड़े का बलि से इतर होती प्रतीत होती है।

सोम: कुछ लोग इसे शराब (मद्य) मानते हैं लेकिन कई अनुवादों के अनुसार इसे कूट-पीसकर बनाया जाता था। अतः ये शराब जैसा कोई पेय नहीं लगता। पर इसके असली रूप का निर्धारण नहीं हो पाया है।

इन्हें भी देखें[edit | edit source]

सन्दर्भ[edit | edit source]

  1. Template:Cite web
  2. गीता २.५३ - श्रुति विप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला। समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्यसि॥ - यानि (हे अर्जुन) यदि तुम्हारा मन श्रुति में घुसकर भी शांत रहे, समाधि में बुद्धि अविचल रहे तभी तुम्हें सच्चा दिव्य योग मिला है।
  3. आर्यों का आदिदेश
  4. शतपथ ब्राह्मण के अनुसार - 'अग्नेर्वा ऋग्वेदो जायते वयोर्यजुर्वेदः सूर्यात् सामवेदः, यानि अग्नि ऋषि से ऋक्, वायु ऋषि से यजुस् और सूर्य ऋषि से सामवेद का ज्ञान मिला। अङ्गिरस ऋषि को अथर्ववेद का ज्ञान मिला। इससे ब्रह्मा जैसे ऋषियोंने चारो वेदौंकी शिक्षाको स्वयं साक्षात्कार कर अन्य विद्वानों में फैलाया। श्रुतिपरंपरा में वेदग्रहणकालमें ब्रह्मा के चतुर्मुख होने का वर्णन आया है
  5. वैशेषिक दर्शन, प्रथम अध्याय, प्रथम माह्नक, तृतीयश्लोक
  6. ऋंगवेद संहिता प्रथम भाग में ख्याति प्राप्त प्रोफेसर मैक्स मूलर लिखते हैं (प्राक्कथन, पृष्ठ १०) कि वे इस बात से आश्वस्त हैं कि ये दुनिया की प्राचीनत मग्रन्थ (पुस्तक) हैं।
  7. Life And Letters Of Fredrick Maxmueller Vol. I, Chap. XV, Page 34
  8. Ibid, Vol. I, Chap. XVI, Page 378
  9. Origin And Spread Of Tamils By V. R. Ramachandra Dikshitar, P. 14
  10. Original Sanskrit Texts By Mr. Muir Vol. II, Page 387
  11. Original Sanskrit Texts Vol. II (Writer - Muir)
  12. History Of India Vol. I (Writer - Elphinstion)
  13. Hindustan Times, 31st October 1977
  14. Mr. Vishnu Shridhar Vakankar's Thoughts, Times Of India, Ahmedabad, Published in 22/12/1985
  15. From The Mohanjo-Daro And The Indian Civilization Edited By Sir John Marshall, Cambridge 1931
  16. ऋग्वेद १।१६४।२०
  17. पुस्तक मानवेर आदि जन्मभूमि लेखक श्रीविद्यारत्न जी, पृष्ठ १२४
  18. पाठ्यपुस्तक प्राचीन भारत, पाठ वैदिक युग का जीवन, दिल्ली सन् १९८६
  19. Indian Express 5/9/1977
  20. Template:Cite book

बाहरी कडियाँ[edit | edit source]

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