Wp/anp/डा (सर) जगदीश चन्द्र बोस

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জগদীশ চন্দ্র বসু
जगदीश चन्द्र बसु

प्रयोगशाला में बसु
Born Template:Wp/anp/जन्म तिथि
मेमनसिंह, पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश), ब्रिटिश भारत
Died Template:Wp/anp/मृत्यु तिथि
गिरिडीह, बंगाल प्रेसिडेंसी, ब्रिटिश भारत
Residence अविभाजित भारत
Nationality ब्रिटिश भारतीय
Fields भौतिकी, जीवभौतिकी, जीवविज्ञान, वनस्पतिविज्ञान, पुरातत्व, बांग्ला साहित्य, बांग्ला विज्ञानकथाएँ
Institutions प्रेसिडेंसी कालेज, कोलकाता
Alma mater कलकत्ता विश्वविद्यालय
क्राइस्ट महाविद्यालय, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय
लंदन विश्वविद्यालय
Doctoral advisor जॉन स्ट्रट (लॉर्ड रेले) 20px
Known for मिलिमीटर तरंगें
रेडियो
क्रेस्कोग्राफ़

डॉ. (सर) जगदीश चन्द्र बसु (बंगाली: জগদীশ চন্দ্র বসু जॉगोदीश चॉन्द्रो बोशु) (30 नवंबर, 185823 नवंबर, 1937) भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे जिन्हें भौतिकी, जीवविज्ञान, वनस्पतिविज्ञान तथा पुरातत्व का गहरा ज्ञान था।[1] ये पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने रेडियो और सूक्ष्म तरंगों की प्रकाशिकी पर कार्य किया। वनस्पति विज्ञान में इन्होंने कई महत्त्वपूर्ण खोजें की। साथ ही ये भारत के पहले वैज्ञानिक शोधकर्त्ता थे।[2] ये भारत के पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने एक अमरीकन पेटेंट प्राप्त किया। इन्हें रेडियो विज्ञान का पिता माना जाता है।[3] ये विज्ञानकथाएँ भी लिखते थे, और इन्हें बंगाली विज्ञानकथा-साहित्य का पिता भी माना जाता है।

ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रांत में जन्मे बसु ने सेन्ट ज़ैवियर महाविद्यालय, कलकत्ता से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। ये फिर लंदन विश्वविद्यालय में चिकित्सा की शिक्षा लेने गए, लेकिन स्वास्थ्य की समस्याओं के चलते इन्हें यह शिक्षा बीच में ही छोड़ कर भारत वापिस आना पड़ा। इन्होंने फिर प्रेसिडेंसी महाविद्यालय में भौतिकी के प्राध्यापक का पद संभाला और जातिगत भेदभाव का सामना करते हुए भी बहुत से महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयोग किये। इन्होंने बेतार के संकेत भेजने में असाधारण प्रगति की और सबसे पहले रेडियो संदेशों को पकड़ने के लिए अर्धचालकों का प्रयोग करना शुरु किया। लेकिन अपनी खोजों से व्यावसायिक लाभ उठाने की जगह इन्होंने इन्हें सार्वजनिक रूप से प्रकाशित कर दिया ताकि अन्य शोधकर्त्ता इनपर आगे काम कर सकें। इसके बाद इन्होंने वनस्पति जीवविद्या में अनेक खोजें की। इन्होंने एक यन्त्र क्रेस्कोग्राफ़ का आविष्कार किया और इससे विभिन्न उत्तेजकों के प्रति पौधों की प्रतिक्रिया का अध्ययन किया। इस तरह से इन्होंने सिद्ध किया कि वनस्पतियों और पशुओं के ऊतकों में काफी समानता है। ये पेटेंट प्रक्रिया के बहुत विरुद्ध थे और मित्रों के कहने पर ही इन्होंने एक पेटेंट के लिए आवेदन किया। हाल के वर्षों में आधुनिक विज्ञान को मिले इनके योगदानों को फिर मान्यता दी जा रही है।

प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा[edit]

बसु का जन्म बंगाल (अब बांग्लादेश) में मेमनसिंह में हुआ था। इनके पिता भगवान चन्द्र बसु ब्रह्म समाज के नेता थे और फरीदपुर, बर्धमान एवं अन्य जगहों पर उप-मैजिस्ट्रेट या सहायक कमिश्नर थे।[4][5] इनका परिवार रारीखाल गांव, बिक्रमपुर से आया था, जो आजकल बांग्लादेश के मुन्शीगंज जिले में है।[6]

बसु की शिक्षा एक बांग्ला विद्यालय में प्रारंभ हुई। इनके पिता मानते थे कि अंग्रेजी सीखने से पहले अपनी मातृभाषा अच्छे से आनी चाहिये। विक्रमपुर में १९१५ में एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए बसु ने कहा- "उस समय पर बच्चों को अंग्रेजी विद्यालयों में भेजना हैसियत की निशानी माना जाता था। मैं जिस बांग्ला विद्यालय में भेजा गया वहाँ पर मेरे दायीं तरफ मेरे पिता के मुस्लिम परिचारक का बेटा बैठा करता था और मेरी बाईं ओर एक मछुआरे का बेटा। ये ही मेरे खेल के साथी भी थे। उनकी पक्षियों, जानवरों और जलजीवों की कहानियों को मैं कान लगा कर सुनता था। शायद इन्हीं कहानियों ने मेरे मस्तिष्क में प्रकृति की संरचना पर अनुसंधान करने की गहरी रुचि जगाई।"Template:Wp/anp/Ref label[5]

रेडिओ की खोज[edit]

ब्रिटिश सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी जेम्स क्लर्क मैक्सवेल ने गणितीय रूप से विविध तरंग दैर्ध्य की विद्युत चुम्बकीय तरंगों के अस्तित्व की भविष्यवाणी की थी, पर उनकी भविष्यवाणी के सत्यापन से पहले 1879 में निधन उनका हो गया। ब्रिटिश भौतिकविद ओलिवर लॉज मैक्सवेल तरंगों के अस्तित्व का प्रदर्शन 1887-88 में तारों के साथ उन्हें प्रेषित करके किया। जर्मन भौतिकशास्त्री हेनरिक हर्ट्ज ने 1888 में मुक्त अंतरिक्ष में विद्युत चुम्बकीय तरंगों के अस्तित्व को प्रयोग करके दिखाया। इसके बाद, लॉज ने हर्ट्ज का काम जारी रखा और जून 1894 में एक स्मरणीय व्याख्यान दिया (हर्ट्ज की मृत्यु के बाद) और उसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया। लॉज के काम ने भारत के बोस सहित विभिन्न देशों के वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित किया.

बोस के माइक्रोवेव अनुसंधान का पहली उल्लेखनीय पहलू यह था कि उन्होंने तरंग दैर्ध्य को मिलीमीटर स्तर पर ला दिया(लगभग 5 मिमी तरंग दैर्ध्य)। वे प्रकाश के गुणों के अध्ययन के लिए लंबी तरंग दैर्ध्य की प्रकाश तरंगों के नुकसान को समझ गए।

1893 में, निकोला टेस्ला ने पहले सार्वजनिक रेडियो संचार का प्रदर्शन किया. एक साल बाद, कोलकाता में नवम्बर 1894 के एक (या 1895) सार्वजनिक प्रदर्शन दौरान , बोस ने एक मिलीमीटर रेंज माइक्रोवेव तरंग का उपयोग बारूद दूरी पर प्रज्वलित करने और घंटी बजाने में किया। लेफ्टिनेंट गवर्नर सर विलियम मैकेंजी ने कलकत्ता टाउन हॉल में बोस का प्रदर्शन देखा। बोस ने एक बंगाली निबंध, 'अदृश्य आलोक' में लिखा था, "अदृश्य प्रकाश आसानी से ईंट की दीवारों, भवनों आदि के भीतर से जा सकती है, इसलिए तार की बिना प्रकाश के माध्यम से संदेश संचारित हो सकता है." रूस में पोपोव ने ऐसा ही एक प्रयोग किया।

बोस क "डबल अपवर्तक क्रिस्टल द्वारा बिजली की किरणों के ध्रुवीकरण पर" पहला वैज्ञानिक लेख, लॉज लेख के एक साल के भीतर, मई 1895 में बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी को भेजा गया था। उनका दूसरा लेख अक्टूबर 1895 में लंदन की रॉयल सोसाइटी को लार्ड रेले द्वारा भेजा गया। दिसम्बर 1895 में, लंदन पत्रिका इलेक्ट्रीशियन (36 Vol) ने बोस का लेख "एक नए इलेक्ट्रो-पोलेरीस्कोप पर" प्रकाशित किया। उस समय अंग्रेजी बोलने वाली दुनिया में लॉज द्वारा गढ़े गए शब्द 'कोहिरर' क प्रयोग हर्ट्ज़ के तरंग रिसीवर या डिटेक्टर के लिए किया जाता था. इलेक्ट्रीशियन ने तत्काल बोस के 'कोहिरर' पर टिप्पणी की. (दिसम्बर 1895). अंग्रेजी पत्रिका (18 जनवरी 1896) इलेक्ट्रीशियन से उद्धृत टिप्पणी है:

   "यदि प्रोफेसर बोस अपने कोहिरर को बेहतरीन बनाने में और पेटेंट सफल होते हैं, हम शीघ्र ही एक बंगाली वैज्ञानिक के प्रेसीडेंसी कॉलेज प्रयोगशाला में अकेले शोध के कारण नौ-परिवहन की तट प्रकाश व्यवस्था में नई क्रांती देखेंगे।"

बोस "अपने कोहिरर" को बेह्तर करने की योजना बनाई लेकिन यह पेटेंट के बारे में कभी नहीं सोचा।

संदर्भ[edit]

  1. A versatile genius, Frontline 21 (24), 2004.
  2. Chatterjee, Santimay and Chatterjee, Enakshi, Satyendranath Bose, 2002 reprint, p. 5, National Book Trust, ISBN 81-237-0492-5
  3. A. K. Sen (1997). "Sir J.C. Bose and radio science", Microwave Symposium Digest 2 (8-13), p. 557-560.
  4. Template:Wp/anp/Cite web
  5. 5.0 5.1 Mukherji, Visvapriya, Jagadish Chandra Bose, second edition, 1994, pp. 3-10, Builders of Modern India series, Publications Division, Ministry of Information and Broadcasting, Government of India, ISBN 81-230-0047-2
  6. Template:Wp/anp/Cite web

टीका टिप्पणी[edit]

क.

Template:Wp/anp/Note label अंग्रेजी में मौलिक भाषण: “At that time, sending children to English schools was an aristocratic status symbol. In the vernacular school, to which I was sent, the son of the Muslim attendant of my father sat on my right side, and the son of a fisherman sat on my left. They were my playmates. I listened spellbound to their stories of birds, animals and aquatic creatures. Perhaps these stories created in my mind a keen interest in investigating the workings of Nature.”

बाह्य सूत्र[edit]

श्रेणी:व्यक्तिगत जीवन श्रेणी:भारत

श्रेणी:भारतीय वैज्ञानिक Template:Wp/anp/भारतीय विज्ञान